एक बांध सब्र का ...
Author :
सदा
Blog :sada-srijan
Date: 10/4/2012 11:33:00 AM
दर्द की भाषा कभी पढ़ी तो नहीं मैने
बस सही है हर बार
एक नये रंग में
उसी से यह जाना है
ये दर्द जब भी होता है
किसी अपने को तो
कई बार हमारी आंखों से भी
बह निकलता है
इसकी पीड़ा से जब व्याकुल होता है
हमारा ही कोई स्नेही तो हम भी
दर्द की अनुभूति करते हैं
मन ही मन उसका पैमाना तय करते हैं
...
लेकिन यह भी सच है
अपने हिस्से का दर्द हमेशा
खुद को ही सहना होता है
तभी तो हर मन में होता है
एक बांध सब्र का
जिसमें होते हैं कुछ हौसले
कुछ उम्मीदें कुछ समझौते
जिन्हें मजबूती देता है विश्वास
जिससे बुलंद होता है
हर एक अहसास
...