नायक : ऐ शोक हसीना, मखमल की लाल कालीन सी सूरज की किरणे, जैसे पूरे आसमा में फ़ैल अपने रंग में रंग देती है उसे, वैसे ही आपका साया फ़ैल गया है दिल में मेरे ।
और पहाड़ से निकलती नदी, जैसे छल - छला कर बहती है पत्थरो की चट्टान के ऊपर से एक चांदनी रात में, जब पानी की कल-कलाहट और उसकी तन्हाई ही उसके हमराज़ हो, वैसे ही आपके जिस्म की खुशबू बह रही हैं आग बन कर दिल-ओ - दिमाग में ।नायिका : बहुत शुक्रिया, मेरे लिए कही ये पंक्तिया आपने अगर।
नायक : क्यूँ शर्मिंदा किया आपने सवाल पूछ कर ऐसा हमसे । क्या सूरज जब उगता है तो रोज़ पूछती धरती कि तुम क्या मेरे लिए उगे हो आज फिर से ?