कितना फर्क होता है न ...
Author :
सदा
Blog :sada-srijan
Date: 6/5/2012 5:49:00 AM
तुम्हारी खामोशी के बीच
सन्नाटा घुटनों के बल
चलते हुए जाने कब
अपने पैरों पे खड़ा हो गया
देख रहा था
आपनी पारखी नज़रों से
तुम्हारी मायूसी को
कभी तुम्हारी
खिलखिलाती हँसी ने
सन्नाटे को भी
मुस्कराहटों के संग साझा किया था
....
सन्नाटे ने पहली बार
महसूस किया था
हँसी की मधुरता को
तभी तो आज फिर वह विचलित था
कौन है वो ऐसा
जिसने तुम्हें कैद कर लिया है
उदास चेहरे के पीछे
उसने देखा दीवारों को
जिनसे रौनक गायब थी
बिल्कुल तुम्हारे चेहरे की तरह
कितना फर्क होता है न
खिलखिलाती हँसी और फीकी हँसी में
एक बोझिल सी
एक अल्हड़ नदी सी ...