उसे लिखना तो नहीं आता
पर वो अश्कों की नमी के बीच
हिचकियों के साये में
अटक - अटक कर बोल रही थी
इन शब्दों को
मन द्रवित हो गया ...
माँ
मुझे तुम
खेलने को खिलौना मत दो
पर मेरे मन को
यह मत कहो कि
वह खिलौना देखकर
मचलना छोड़ दे ...
मेरे मन का बच्चा अभी भी
तुम्हारे साये में चलता है
उससे ये मत कहो
कि वो तुम्हारी
थाम के उंगली चलना छोड़ दे ...!!!