दु:खी होने के लिए
अब बड़ी घटनाओं की
जरूरत नहीं रही मन को
वो यूँ ही कभी भी
हो जाता है अनमना
सब कुछ सही होते हुए
जब भी
नासमझी के लक्षण दिमाग में
उथल-पुथल कर देते
वक़्त-बेवक़्त
जब भी इसकी-उसकी परव़ाह की
बात होती
मन उदास हो जाता
अब मन उदास हो तो भला
चेहरे पे मुस्कान :)
कैसे आएगी
लक़ीर के फ़क़ीर बनोगे जब
तो सब कुछ
एक दाय़रे में सिमटकर
रह जाएगा फि़र
आज कौन किसकी परव़ाह करता है
सब अपने लिए जीते हैं
अपनी मैं को सर्वोपरि मानते हैं
खुद की खुशियाँ
खुद के सपने वो दिन गए
जब बेग़ानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना
हुआ करता था ...
ये ऐसी कड़वी बातें क्यूँ ?
नीम का दातुन किया था न
अभी तक उसका
कसैलापन गया नहीं
या फिर सबकुछ कसैला हो गया है
शायद इसीलिए....!!!