ओनी पोनी जिन्दगी ..
Author
: VIJAY PATNI
Blog
: Dil ki kalam se
Date
: 5/4/2013 5:07:00 AM
'ये जिन्दगी ...जो कभी कहानी तो कभी गजल रही है ..!कभी मछली सी ...हाथो में है , जीने के लिए मचल रही है !! कभी गीली साबुन सी ..पकड़ना चाहो तो भी फिसल रही है !कभी थक कर बैठ रही , कभी ख़ुशी से उछल रही है ये जिन्दगी जो हर पल बदल रही है ...जितना जीया इसे, उतना हाथ से निकल रही है !ओनी पोनी जिन्दगी , आधा इंच ख़ुशी और एक इंच गम के बीच चल रही है ..गिर रही है संभल रही है !! '
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दो शक्लों वाला बलात्कार...
Author
: VIJAY PATNI
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: Dil ki kalam se
Date
: 4/20/2013 9:59:00 AM
'ये दो शक्लों वाला बलात्कार मुझे पचता नहीं हैतुम्हारी राजधानी में हुआ बलात्कार अत्याचार है और हमारे कस्बें में हुआ बलात्कार चंद रुपयों का व्यपार है ?सिर्फ इसलिए की वहां मीडिया है, हाई प्रोफाइल लोग है |लाखों मोमबत्तियां और करोडो "मेल" फेशन में आ जातें है ||चार दिन सार देश आँसूं बहाता है और फिर पांचवे दिन ipl का नाच दिखाता है !हमारे अख़बारों में स्त्रियाँ रोज दम तोड़ती हैरोज चीथड़े चीथड़े होता है बचपनपर किसी के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती ?बड़ी "ढीट" व्यवस्था है, सिर्फ क(...)'
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pyar..ek dhokha.
Author
: EKTA
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: Dil ki kalam se
Date
: 2/18/2013 12:19:00 PM
' सोचा था उनसे बिछड़ कर जी नहीं पाएँगे,, कैसे उनका प्यार दिल से भुलाएंगे,,दफ़न कर के सीने में यादों का मंजर कैसे उन पर एक नया घरोंदा बनायेंगे।पर मालूम ना था कि ये प्यार नहीं साज़िश है उनकी,,हमारी बर्बादी ही मंजिल है उनकी,,रब्ब मान कर पूजते थे (...)'
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खबर...
Author
: VIJAY PATNI
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: Dil ki kalam se
Date
: 1/13/2013 8:57:00 AM
'जब उसका जन्म हुआसब उसके आस पास थे ....घेरे थे सब उसको चारों और सेसब उसके अंदर तक झांक लेना चाहते थेउसके जर्रे जर्रे को.. पहचान लेना चाहते थेकिसी ने देख कर आह किया , किसी ने वाह कियाकिसी ने एक दो और जोड़ कर उसे अफवाह किया ||वो सुर्ख़ियों में रही कुछ दिन ...दुनियां के आसुओं से उसकी जिन्दगी नम हुई ...फिर कुछ दिन बीते , भीड़ उसके आस पास कम हुई ...जख्म भरने कोई आगे नहीं आया, वो अपने में ही गुम हुई ..सिर्फ पुराने पन्नों में ,उसकी जिन्दगी छुपी है ...वो एक "खबर" थी जो अब दम तोड़ चुकी (...)'
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सिर्फ इतना सा कर लो ..
Author
: VIJAY PATNI
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: Dil ki kalam se
Date
: 1/5/2013 10:16:00 AM
'सुनो जहमत करो, अपनी सोच को बदलने की जरा सी ...आज उसका दर्द , जो तुम्हे, महसूस नहीं हो रहा , कल वो दर्द, तुम्हे भी हो सकता है दर्द को बांधों मत किसी दायरे में ...|कुछ देर के लिए आईपॉड के इअर फ़ोन को कानों से हटा कर, सुन भी लिया करो ..की कोई दर्द से करहा तो नहीं रहा सड़क किनारे ...?तुम्हारी आँखें अनदेखा क्यूँ कर देती है ..?सड़क किनारे सर्दी में ठिठुरते, नग्न आदमी कोधुप से बचने का काल चश्मा , इंसानियत पर क्यूँ लगा लेते हो ?खून रिसता क्षत विक्षत शरीर जो दिखाई पड़ेभयभीत मत(...)'
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रस्म निभाने के लिए दिवाली है ...
Author
: VIJAY PATNI
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: Dil ki kalam se
Date
: 11/12/2012 10:06:00 AM
'"अपने घर का कचरा , सड़क पे डालने के लिए दिवाली है ...मिलावट की मिठाइयाँ , गरीबों को बांटने के लिए दिवाली है ..बेजुबान जानवरों को सताने के लिए दिवाली है फटाके फोड़ के , प्रदुषण फ़ैलाने के लिए दिवाली है ..गर सरकारी अफसर हो आप तो जम कर खाने , के लिए दिवाली है ...गर हो दुकानदार, तो थोडा बहुत कमाने के लिए दिवाली है ...अजनबियों से मेल मिलाप बढ़ाने के लिएदिवाली है "दीया तले अँधेरा" यह जताने के लिए दिवाली है ...दीप नहीं, दिल जल रहें है, ये बताने के(...)'
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खाली हाथ ...
Author
: VIJAY PATNI
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: Dil ki kalam se
Date
: 9/29/2012 12:48:00 PM
'सूरज आता खाली हाथ ... चाँद खाली हाथ जाता है कुछ खुशियाँ खोजने में ...पूरा दिन निकल जाता है ||इस कद्र पड़ी है महंगाई की मार सब पर अब आम दिनों सा... त्यौहार निकल जाता है ..||झूठे वादें झूटी कसमें और बेफिजूल की रस्में इन्ही चक्करों में सबका संसार निकल जाता है ||जेब में जब आ जाता है गाँधी उनके ..मन से उनके गाँधी बनने का विचार निकल जाता है||लाख चाहता है हर एक ..."अन्ना" के रास्ते पर चलना पर जिन्दगी की रेस में ..आगे... भ्रष्ट(...)'
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आखिर क्या देख रहा है ?
Author
: VIJAY PATNI
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: Dil ki kalam se
Date
: 7/26/2012 6:29:00 AM
'गुवाहटी कि शर्मनाक घटना के बाद , यशवंतपुर मैसूर ट्रेन में एक लड़की के साथ वही हरकत दोहराई गयी , लेकिन समाज मीडिया और आम जन सिर्फ ख़ामोशी से तमाशा देख रहें है :) जागो इंडिया जागो ||जिस के आँचल में पल कर.. बड़ा हुआ जग आज उजड़ता हुआ उसका बदन , तार तार देख रहा है दिमाग पर काला चश्मा लगा कर हर व्यक्ति ये समाचार देख रहा है ?वो जो शख्स आँखों से , स्त्री पर अत्याचार देख रहा है वो अपनी ही मौत का इंतजार देख रहा है !!दूध का कर्ज च(...)'
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पांचवी गजल
Author
: VIJAY PATNI
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: Dil ki kalam se
Date
: 7/24/2012 6:12:00 AM
'उसकी हर हरकत का हिसाब रखते है हम दिल में, मोहब्बत की किताब रखतें है !! वो चेहरे पर चाँद लिए घुमती है हम आँखों में.. हमेशा रात रखतें है | जब भी मिलें हमसे ..बैचैनी से मिलें वो इसलिए हर बार, अधूरी मुलाक़ात रखतें है || पतझड़ में भी सावन सी बदली हो जाये अपने शब्दों में... हर वो बात रखते है ||कुछ थामना चाहेगी , जब थक जायेगी ज़माने से इसलिए , हम ...हमेशा ...खाली हाथ... रखतें हैजाने कब उसकी पलकों से उतर आयें जिन्दगी एक अधुरा ख्वाब हमेशा साथ रखतें है !!उसकी हर हरकत का हिसा(...)'
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माँ ... मुझे ना दे जन्म ...
Author
: VIJAY PATNI
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: Dil ki kalam se
Date
: 7/17/2012 5:31:00 AM
'माँ मुझे ना दे जन्म ...मैं यूँ मर मर के, जी ना पाउंगी अच्छा होगा यदि कोख में ही मर जाउंगी !! :).....माँ , जब चाहा पापा ने अपना गुस्सा तुझ पर उतारा वजह- बेवजह तुझ को मारा !!तू चुप कर के , जो सहती है , मैं सह ना पाउंगी अच्छा होगा, यदि कोख में ही मर जाउंगी !! :).....माँ, जब तू ऑफिस से आने में दो घंटे लेट हो जाती है घर पर सब का पारा गर्म हो जाता है हजारों अनचाहे सवालों का जन्म हो जाता है तू जिन सवालों को सुलझाती है , मै सुलझ(...)'
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उसकी शादी हो गई है !!
Author
: VIJAY PATNI
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: Dil ki kalam se
Date
: 7/9/2012 10:00:00 AM
'खेलती थी कूदती थी अपने मन की करती थी तितली सी थी ..अपने बाग़ में इधर उधर उडती रहती थी || कुछ दिनों से वो गुमसुम है ... चुप चुप है लोग कहते है वैसा करती है देर रात को सोती है ...सुबह जल्दी उठती है |कुछ आवाजें उसे .... ..अक्सर टोकती रहती है || वो ना जाने क्या क्या सोचती रहती है !! खोने की उम्र है, पर सब कुछ संभाल रही है खुद को नये संस्कारों में ढाल रही है अपने आप को फिर से खंगाल रही है ||(...)'
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कुछ लिखना है , ऐसा...
Author
: VIJAY PATNI
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: Dil ki kalam se
Date
: 6/18/2012 5:25:00 AM
'कुछ लिखना है , कुछ ऐसा , जो अब तक ना लिखा गया हो कुछ ऐसा , जो अब तक ना ही कहा गया हो , ना ही सुना गया हो कुछ ऐसा लिखना है, जिसे पढ़ कर काम क्रोध मोह माया सब शांत हो जाएँ कुछ ऐसा लिखना है, की "सपनों में ही , हकीकत वाली रात हो जाए ............. चंद शब्दों में ही सारी बात हो जाए ||कुछ लिखना है , ऐसा, उस गरीब के लिए दो वक्त की रोटी जैसा कुछ लिखना है छोटा ..सुई की छेद की तरह ,पर जिस का आकार हो ...हिमालय की चोटी जैसा |कुछ लिखना है.(...)'
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लघु कथा :- महंगाई
Author
: VIJAY PATNI
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: Dil ki kalam se
Date
: 5/27/2012 5:17:00 AM
'पापा कितनी महंगाई है , और देखो , सरकारी अफसरों का महंगाई भत्ता बढ़ गया है , पापा कल मुझे अपने दोस्तों की पिक्चर दिखाने ले जाना है तो मेरी पॉकेट मनी भी जरा बढ़ा दो अब , और सुनिए जी मेरी किटी पार्टी वालों ने , घुमने जाने का प्लान बनाया है , तो मुझे भी इस बार दो हजार रुपये ज्यादा चाहिए | और हाँ एक नयी साडी तो बनती है, सेलरी बढ़ने की ख़ुशी में...क्यूँ बेटी ?हाँ माँ , और मुझे भी नया मोबाइल चाहिये |इतने में माँ का फ़ोन आता है , पिछले कई सालों से , माँ को सिर्फ पांच सौ रुपये महीने दिए(...)'
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तेरे बिना बेस्वाद जी जिन्दगी
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: VIJAY PATNI
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: Dil ki kalam se
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: 5/26/2012 11:14:00 AM
'तेरे बिना बेस्वाद जी जिन्दगी ...खाए जा रहा हूँ मै बस जीने की अपनी भूख, मिटायें जा रहा हूँ |तुझ को देख कर ...किया था वादा ...हमेशा मुस्कराने का बस वोही अधूरी मोहब्बत ...अब तक ....निभाए जा रहा हूँ तेरे बिना बेस्वाद जी जिन्दगी ....खाए जा रहा हूँ |चाँद को देखा नहीं , तेरे चेहरे को देखने के बादचांदनी रात में सिर्फ , तारों से काम चला रहा हूँ तेरे बिना बेस्वाद जी जिन्दगी ....खाए जा रहा हूँ |यूँ अकेले अकेले जीना भी कोई जीना है ? जिन्दा हू(...)'
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मजदूर या मजबूर दिवस
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: VIJAY PATNI
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: Dil ki kalam se
Date
: 5/1/2012 3:50:00 AM
'सर पर तगारी, या हाथ में फावड़ा हमेशा वो दिखा मुझे , धुप से लड़ता हुआ अपने से , चौगुना वजन लिए गर्म सडक पर नंगे पैर , सरपट बढ़ता हुआ | अपने पेट की अग्न को , शांत करने खातिर खुद से हमेशा लड़ता हुआ ..वातानुकूलित भवनों में रहने वाले, लोकतंत्र से थोडा सहम थोडा डरता हुआ .. :(इस महंगाई के महादानव से तिल तिल कर मरता हुआ |हमेशा दिखा मुझे, वो मजदुर , "मजबूर" मौत में जिन्दगी भरता हुआ ||चाहें लग जाए सावन या चल रहा हो वसंतपर (...)'
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क्या कभी जीया है, ऐसा जीवन ?
Author
: VIJAY PATNI
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: Dil ki kalam se
Date
: 4/29/2012 5:35:00 AM
'क्या कभी किसी की आवाज में, नमी महसूस की है ? क्या तुमने जिन्दगी में , जिन्दगी की कमी महसूस की है ?क्या महसूस हुआ है तुम्हे, किसी गैर का दर्द क्या बिताई है खुले आकाश में ,एक रात सर्द ?क्या किसी के सपनों को, अपनी जमीं दी है ?क्या किसी की आँखों को, खुशियों की नमी दी है ?क्या किसी के पैर के छालों पर, मरहम लगाईं है क्या किसी तन्हा को दी, प्यार की दवाई है ?खुद रहतें हुए अंधेरों में , क्या किसी को दिए उजालें है ?किसी और के गम क्या, कभी खुद ने संभालें है (...)'
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अर्जियां मेरी ..
Author
: VIJAY PATNI
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: Dil ki kalam se
Date
: 4/22/2012 4:59:00 AM
' लिखी सौं अर्जियां.. , उसके दर तक , एक भी , भेजी जा ना सकी |मुरादें मेरी ...उसके दर से ..पूरी हो कर , आ ना सकी |उसे यकीन था ...वो मुझे ...इतना तोड़ देगा की मैं हाथ फैलाये , उसके दर तक चला आऊंगा ...!पर हमसे हमारी खुशियाँ , कभी मांगी ना जा सकी |वो पत्थर का ही था , यह भी साबित हुआ दिल की बातें ...उसके कानों तक जा ना सकी ||मुरादें मेरी ...उसके दर से ...पूरी हो कर आ ना सकी | वो लेता रहा सब्र का इम्तेहां मेरे .(...)'
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बचपन बचाओ :)
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: VIJAY PATNI
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: Dil ki kalam se
Date
: 4/3/2012 5:53:00 AM
'बचपन कैद रहिसों के मकानों मेंरसोई में झूठे बर्तनों से ,खिलोने खेल रहें हैवो गरीबी का भारी बोझ...अपने कोमल कन्धों पर झेल रहें है |लोग देश के भविष्य को , कूड़ें में फेक रहें है |सब मूक बन कर , नेहरु के गुलाब कोटुकड़ा टुकड़ा, बिखरते देख रहे है |समाज चुप है , चुप सरकारें भी हैसब बचपन की लाश पर, अपनी रोटियां सेक रहें है |बचपन यदि सही पल्लवित नहीं हुआतो एक सभ्य समाज , कैसे बना पाओगे ?बचपन यदि बिगड़ा , अपना घर कैसे बचाओगे ?समय है बचपन को सँभालने का ,इस गुलाब को... महकती बगिया में(...)'
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वक्त के पन्ने रेत से...
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: VIJAY PATNI
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: Dil ki kalam se
Date
: 3/29/2012 4:33:00 AM
'वक्त के पन्ने रेत से, मेरे हाथ से फिसलते गये जहाँ मौका मिला खुशियाँ थक कर बैठ गयी गम मेरे साथ, उम्र भर चलते गये | यादें सिर्फ ताउम्र साथ रहीं मेरे लोग बिछड़ते गयें ... लोग मिलतें गये |वक्त के पन्ने रेत से, मेरे हाथ से फिसलते गये |मुसाफिर से मिले, मुझसे "अपने" भी यहाँ खुशियों में लगाया गले . दुःख में किनारा कर, निकलते गये |जो शख्स मुस्करा कर मिला, हमने उस को "हक" दिया लोग धोखा देते गये , हम गिर गिर कर संभलते गये वक्त के पन्ने रेत से, मेरे हाथ से फिसलते गये |मेरे ख्वाबों की कब्रों पर(...)'
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दीवारें
Author
: VIJAY PATNI
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: Dil ki kalam se
Date
: 3/9/2012 8:35:00 AM
'जानते हो ? तुमसे ज्यादा तो मुझे, इस घर की दीवारें जानती है ....जब तुम सुनते नहीं मेरी , मैं सब इन को सुना देती हूँ जब तुम फाइलों में उलझे,मुझे भूल जाते हो , मैं इनसे रिश्तें बना लेती हूँ |तुम जानते हो ?ये मुझे सहारा देती है ...जब बातों के भंवर में होती हूँ मैं , ये मुझे किनारा देती है |कभी जब थक जाती हूँ खुद से , ये मुझे फिर से जीने का इशारा देती है ...मैं इन्हें अपनी सब परेशानियाँ सुना देती हूँ ...जब तुम फाइलों में उलझे,मुझे भूल जाते हो , मैं इनसे रिश्तें बना लेती हूँ |ये जो दीवार (...)'
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