भगवानदास गुहा एक अदभुत आश्चर्य जनक किंतु सत्य के साथ
Author
: Girish Billore
Blog
: नुक्कड़
Date
: 25-05-2013 21:17:00
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क्रिकेट की कालिख को अपने पसीने और सपनों से धोता युवा भारत
Author
: संजीव शर्मा
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: नुक्कड़
Date
: 23-05-2013 09:02:00
'क्रिकेट की कालिख को अपने पसीने और सपनों से धोता युवा भारत दिल्ली की झुलसा देने वाली गर्मी में दोपहर के तीन बजे इंदिरा गाँधी स्टेडियम के बास्केटबाल कोर्ट में पसीने से लथपथ सातवीं कक्षा की आद्या से लेकर ग्यारहवीं के अखिलेश तक हर एक बच्चे की आँखों में एक ही सपना नजर आता है-पहले स्कूल और फिर देश के लिए खेलना. पैसों,प्रसिद्धि,प्रतिष्ठा और प्रभाव से भरपूर क्रिकेट के सर्वव्यापी आतंक के बीच इन बच्चों का पैंतालीस डिग्री तापमान में घर से बाहर निकलकर दूसरे खेलों में रूचि दिखाना देश(...)'
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विसंगतियों पर प्रहार करते मनमौजी व्यंग्य - व्यंग्य का शून्यकाल की बालेन्दु शर्मा दाधीच लिखित समीक्षा प्रभासाक्षी के 22 मई 2013 में
Author
: अविनाश वाचस्पति
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: नुक्कड़
Date
: 22-05-2013 14:26:00
'पूरी समीक्षा पढ़ने के लिए प्रभासाक्षी में तथा सुनने के लिए यू ट्यूब में क्लिक करके सुन सकते हैं।बिना क्लिक किए पढ़ना चाहें तो नीचे पढ़ लीजिए ।अविनाश वाचस्पति का संकलन 'व्यंग्य का शून्यकाल' दैनिक जीवन की विसंगतियों, विद्रूपताओं और घटनाक्रम पर मनमौजी किस्म की किंतु गहरे अर्थ रखने वाली टिप्पणियों का संग्रह है जो अपनी सरलता और सहजता से प्रभावित करता है। कैसे वे एक रचनाकर्मी की भूमिका से एक सामान्य पाठक की मनःस्थिति में पहुँच जाते हैं और फिर उसी के अंदाज़ में अपने आसपास की दुन(...)'
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मेरे पास मजदूर मां है : बॉलीवुड सिने रिपोर्टर 15 - 21 मई 2013 अंक में प्रकाशित
Author
: नुक्कड़
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: नुक्कड़
Date
: 15-05-2013 19:53:00
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एक अनूठा फिल्म स्कूल और एक नायाब नाट्य विद्यालय * आपके लिए लेकर आया है अंतिम तिथि इमेज पर क्लिक करके जान लीजिए
Author
: नुक्कड़
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: नुक्कड़
Date
: 15-05-2013 11:15:00
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मां का मतलब हां होता है
Author
: अविनाश वाचस्पति
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: नुक्कड़
Date
: 12-05-2013 00:30:00
'हर दिन होता है मां कानहीं प्रश्न इसमें ना काफिर मनाते हैं क्यों सबसिर्फ एक दिन हां का'
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नशा यह फिल्मी है - बॉलीवुड सिने रिपोर्टर के 8 से 14 मई 2013 अंक में प्रकाशित
Author
: नुक्कड़
Blog
: नुक्कड़
Date
: 09-05-2013 11:13:00
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बॉलीवुड सिने रिपोर्टर के 7 मई 2013 तक के अंक में विसंगति की संगति का समन्वयन हैं फिल्में
Author
: नुक्कड़
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: नुक्कड़
Date
: 01-05-2013 19:04:00
'‘मैं क्या करूं राम मुझे बुड्ढा मिल गया’। फिल्म में कलाकार का किरदार एक बुड्ढे का भी और कॉमेडियन का भी। कहां बुढ़ापे के बोर नीरस जीवन के साथ कॉमेडी का भरपूर जलवा। यह फिल्मों में ही संभव है। फिल्म में वह सब संभव है जो साहित्य में असंभव है। साहित्य तो छोड़िए किसी भी रचनात्मक विधा में भी नहीं। फिल्म में सब कुछ घटने के नाम बढ़ता जाता है, सब संभव है। संजीव कुमार नौ जन्म लेते तब भी नौ किरदार बखूबी नहीं निभा पाते लेकिन फिल्म ‘नया दिन नई रात’ में उनकी अदाकारी बेमिसाल (...)'
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मजदूर दिवस पर मजे के पास ?
Author
: अविनाश वाचस्पति
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: नुक्कड़
Date
: 29-04-2013 06:36:00
'चाहे हंसी-मजाक में ही कहा जाता है कि मजदूर यानी मजे से दूर, मजदूर के पास मजे के पास। पर इसमें एक खौफनाक तल्खी छिपी हुई है। मई माह का पहला पूरा दिन सिर्फ मजदूरों की चर्चा के लिए नियत है। ऐसा नहीं है कि इस एक दिन मजदूरों को बिना काम किए पगार मिलेगी या अधिक मिलेगी। जब उतनी मिलने की भी गारंटी नहीं है जितने पर अंगूठा लगवाया जाता है तो अधिक की सोचना ही बेमानी है। कारण इसमें सब तरफ बेईमानी ही पसरी हुई है। चर्चा पूरे दिन मजदूर की ही की जाएगी। मई महीने (...)'
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डरने भी दो यारो : बॉलीवुड सिने रिपोर्टर के 24 - 30 अप्रैल 2013 अंक में प्रकाशित
Author
: नुक्कड़
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: नुक्कड़
Date
: 27-04-2013 13:53:00
'अगर न पढ़ पाएं तो कमेंट में अवश्य बतलायें। हरेक समस्या का समाधान है।'
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वाकई बदल रही है हवा ..इसके आंधी बनने से पहले सुधार जाओ यारो
Author
: संजीव शर्मा
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: नुक्कड़
Date
: 27-04-2013 06:00:00
'सूचनार्थ: जुगाली के इसी लेख को 'सादरब्लागस्ते ' द्वारा आयोजित प्रतियोगिता में राजधानी की प्रतिष्ठित संस्था शोभना वेलफेयर सोसाइटी द्वारा "ब्लाग रत्न" सम्मान से सम्मानित किया गया है....आप सभी सुधी पाठकों के लिए पेश है यह पुरस्कृत आलेख.....******* ******** &nbs(...)'
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आधुनिक साहित्य का समसामयिक हिन्दी व्यंग्य यात्रा विशेषांक : मुख्य अतिथि : नरेन्द्र कोहली
Author
: नुक्कड़
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: नुक्कड़
Date
: 26-04-2013 07:43:00
'पूरी जानकारी और प्रतिक्रियाएं यहां मिलेंगी। आप क्लिक तो कीजिए।कृपया कार्ड को उतना ही ध्यापर्वूक पढ़ें जितना आप किसी व्यंग्य रचना को पढ़ते हैं।'
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भारतीय सिनेमा के सौ वर्ष पूरे होने पर 25 अप्रैल 2013 से 30 अप्रैल 2013 तक अनवरत् नई दिल्ली के सीरी फोर्ट सांस्कृतिक परिसर में आयोजित किए जा रहे कार्यक्रम
Author
: नुक्कड़
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: नुक्कड़
Date
: 25-04-2013 06:56:00
'विवरण के लिए क्लिक कीजिए'
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Falwala
Author
: Girish Billore
Blog
: नुक्कड़
Date
: 23-04-2013 10:12:00
'Meri pandeera dukan'
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खलनायक नहीं, नायक हूं मैं : बॉलीवुड सिने रिपोर्टर 17 से 23 अप्रैल 2013 अंक (पूरा अंक पढ़ने के इच्छुक टिप्पणी में सूचित कीजिए)
Author
: नुक्कड़
Blog
: नुक्कड़
Date
: 20-04-2013 00:32:00
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कह रहे हैं दिल्ली में भूकंप आया था !!! (कैसे मान लूं, नेता तो सारे के सारे साबुत हैं) बकौल काजल कुमार
Author
: अविनाश वाचस्पति
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: नुक्कड़
Date
: 17-04-2013 01:07:00
'कुछ भूकंपनियां फेसबुक पर कल धमाल मचाती रहीं HAPPY BHUKAMPबहुत दिनों बाद आया हैमेहमान है स्वागत करोयूँ न डरो फेसबुक वासियों।भूकम्प से डर लगता हैवह हिलते रहा करेंहिलते रहा करेंमचलते रहा करेंमचलते रहा करेंउछलते रहा करेंफिर भी डर लगेडरते रहा करेंमेरे व्यंग्य पढ़ा करेंउन्हें पसंद किया करेंकमेन्ट किया करेंभूकम्प शर्मिंदा हैकह रहा हैअब नहीं आऊंगा कभीडूब कर मर जाऊंगाअभी के अभी।हम पहले ही हिले हुए है भूकम्प से मिले हुए हैहिले हुए को हिला सकेभूकम्प में दम नही जानीभूकम्प हमसे है समझ लीजेह(...)'
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नायक नहीं खलनायक हूं मैं
Author
: अविनाश वाचस्पति
Blog
: नुक्कड़
Date
: 15-04-2013 08:36:00
'खल खलता तो बहुत है पर नकारात्मकता को सकारात्मकता से लबालब करने का प्रवाह कलाकारों में मिलता है। यह आज के तकनीकी युग में नहीं बल्कि बिना उन्नत तकनीक के मन को भला लग रहा है। खलनायकी की वह जंग जो दर्शक के मन में किरदार के प्रति गहरा आक्रोश भर दे, आपको गुस्से से भरपूर रंग दे। जब आपके सामने किरदार अभिनीत करने वाला कलाकार रूबरू हो और आप उस पर अपशब्दों की बौछार कर दें, मन में सुलग रही आंच भड़क उठे तो यह बुरा नहीं, अभिनेता को सुकून से भर देता है। ऐसे बेशकीमती पल अतीत में कई कलाकारों के(...)'
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जब सुधियों में शेष रह गयी.... (बैसाखी पर गीत)
Author
: हरीश अरोड़ा
Blog
: नुक्कड़
Date
: 13-04-2013 14:52:00
'याद मुझे अब भी आती है,बैसाखी की वही पुरानीतेरे-मेरे मधुर प्यार कीअनभूली-सी प्रेम कहानी.बैसाखी के ढोल बजे थेमेरे पास अचानक आकरमेरे निश्छल गीत नेह केछीन लिए मेरे अधरों सेतेरी कजरारी आँखों ने.भींच लिया था फिर पलकों कोगीतों में ही छिप जाने को..... याद मुझे अब भी आती हैकेसर की हलकी फुहार सेमौसम के इस नए वर्ष मेंसतरंगी मेरे स्वप्नों कोजब तुमने अपने आँगन मेंसजा लिए थे नेह भाव सेछिपा लिया था अपने मन मेंएक रंग में लिथ जाने को..... याद मुझे अब भी आती हैनाच रही थीं फसलें सारी,झूम रहे थे वन-वन (...)'
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ब्लॉग-जगत में 'नारी' की असलियत !!
Author
: संतोष त्रिवेदी
Blog
: नुक्कड़
Date
: 13-04-2013 06:36:00
'यह तथ्य 'नारी-नारी' का झंडा बुलंद करने वाले देख लें,शायद अब भी उनकी आँखें खुल जाएँ. . .भले ही कोई कितना निकट हो,पर यदि उसके कृत्य समाज और आपसी भाईचारे के विरुद्ध हैं तो उसकी निंदा ही करनी चाहिए. . .कई मौकों पर ऐसा साबित हो चुका है,जब 'नारी' को महज़ दूसरों पर छींटाकशी और नकारात्मकता बताने-बढ़ाने के लिए प्रयोग किया गया है.आप इस संबंध में जो भी उचित कार्रवाई हो करिये क्योंकि यह व्यक्तिगत मानहानि तो है ही,हिंदी ब्लॉग-जगत पर भी धब्बा है.रवीन्द्र प्रभात जी की तरफ से परिकल्पना पर यह भंडाफोड (...)'
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क्या किसी समाज का इससे अधिक नैतिक पतन हो सकता है?
Author
: संजीव शर्मा
Blog
: नुक्कड़
Date
: 13-04-2013 03:33:00
'अभी हाल ही में दो परस्पर विरोधाभाषी खबरें पढ़ने को मिली. पहली यह कि केरल के कुछ स्कूलों में पढाने वाली महिला शिक्षकों को प्रबंधन ने साडी या सलवार सूट के ऊपर कोट या एप्रिन नुमा कोई वस्त्र पहनने की हिदायत दी ताकि कक्षा में बच्चों का शिक्षिकाओं की शारीरिक संरचना को देखकर ध्यान भंग न हो, साथ ही वे कैमरे वाले मोबाइल का दुरूपयोग कर चोरी-छिपे महिला शिक्षकों को विभिन्न मुद्राओं में कैद कर उनकी छवि से खिलवाड़ न कर सकें. वहीं दूसरी खबर यह थी कि एक निजी संस्थान ने अपनी एक महिला कर्मचारी को केव(...)'
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