इस बार
Author
: Shalini Sharma
Blog
: Nutshell
Date
: 2/21/2013 2:04:00 AM
'पानी के छींटो जैसे शब्दोकी, हर उछाल में कसमसाया मन,जो मांस का लोथरा नहीं,उछाले मारता,जमीन पर नहीं गिरा इस बार |जैसे, हर छींट से ओक्सिजन छितरा कर,धमनियो में गुलाल बन रम गयी।निशाना चूक गए, नुकीले शब्द, इस बार।'
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पिछले पखवाड़े
Author
: Shalini Sharma
Blog
: Nutshell
Date
: 11/20/2012 2:07:00 PM
'पिछले एक पखवाड़े सेकुछ ऐसा लिखना चाहती थीजो मेरे, तुम्हारे, हमारे बारे में ना हो;जिसमें मैं, तुम, या हम ना हो;जिसे पढ़ कर ये ना लगेकि कोई सिरा तुमसे अब भी जुड़ा है; ऐसे हर सिरे को ख़बरों की तरफ मोड़ दिया,ख़बरों से किसी को लगाव नहीं होतापर हर खबर, अतरंगी दुनिया से जोड़ते हुए,केवल दो पाटों का आईना है - गया कल और आता कलइनके बीच खामखाँ गुमसुम बीतता- अब भर जाना लबों तक एक हिचकी; खुद पर ही खीझती झिझकसिलसिलेवार अखबारों की तह में भीकोई मैं, तुम, और हम ढूंढ ही लेती है;ख़ामोशी की सर्द दीवारें पिघलने (...)'
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जाने क्यूँ
Author
: Shalini Sharma
Blog
: Nutshell
Date
: 11/2/2012 4:50:00 PM
'हौले से हिलता दरवाज़ादरमियानना पूरा खुला ना बंद, अधखुला भी नहीं इस पारउलझन भरेफलसफो से खेलती अलसाई नाराज़गीबिस्तर कि सलवटो में सो गयी,एक बार फ़िरख्वाब ही में सुबह और रात हो गयी....'
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क्यूँ नर्बदा?
Author
: Shalini Sharma
Blog
: Nutshell
Date
: 9/6/2012 4:02:00 PM
'नर्बदा, क्यूँ तुम ही नहीं मुड जाती दिल्ली कि ओर कंपकपाती यमुना को लेघेर लेती चीलो की संसद को?क्यूँ, नर्बदा तुम भी उंगली पकडे खड़ी हो हजारो उन चिंगारियोको तेल देती?नर्बदा, क्यूँ तुम ही नहींचट्टानो को चीर नया रास्ता बना देती,उजाला जो दीयो तले है सब और फैला देती?See: The struggle in Narmada continues No end to water protest in Madhya PradeshVictims protest, while the government threatens to drown them.'
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एक श्रद्धांजली फोन को
Author
: Shalini Sharma
Blog
: Nutshell
Date
: 9/4/2012 10:58:00 PM
'इस फ़ोन से कुछ अजीब ही रिश्ता था, कुछ बेहतरीन समय इसने साथ देखे सुने और; कुछ बेंतहा मुश्किल लम्हे इसने साथ गुजारे,याद है कैसे बार बार हाथ लपक संभाल लेते थेइस छोटे से दोस्त को; जब इसपर ही कंई छोटे बड़े कर्येक्रमो की प्लानिंग होती थी,घंटो इसे अपने कान से लगा;कागजों पर आड़े तिरछे अक्षर लिखती रहती, इस ओर से कुछ बोलती थी;उस पार से साथी कुछ कहते थे,फिर भी; एक साझेदारी थी साथ संघर्ष करने की,संघर्ष में साथ आगे बढ़ने की;और ये दोस्त हमसफ़र ही तो था,हाँ; कभी कभी इसकी बैटरी थक जाती थी,लेकिन(...)'
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प्रकृति और पुरुष
Author
: Shalini Sharma
Blog
: Nutshell
Date
: 8/29/2012 11:39:00 PM
'मैंने पूछा,'क्या हाल चाल?'तुमने कहा,'जंगलों को देखो, कट गए, छट गएजमीन और तालाब जाने कहाँ सिमट गए' मैंने पूछा,'और सब ठीक?'तुमने कहा 'जुगनू, पतंगे, केंचुए सब कहीं खो गएसूरज को ढूंढते, मुंह ढाप सब सो गए'मैंने पूछा, 'कैसे हो?'तुमने कहा, 'सब तरफ शोर है, हर मुंडेर एक मोर हैकौए कोयला खा गए, क्या रात क्या भौर है' तुमने पूछा, 'ठीक हो?'(तुमने पूछा, अच्छा लगा)मैंने कहा, मैंने कुछ नहीं कहा प्रकृति क्या कहे, किससे?जवाब सुनने के लिए कोई नही था..'
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For You (By Arpita Gaidhane)
Author
: Shalini Sharma
Blog
: Nutshell
Date
: 7/2/2012 12:34:00 AM
'Words overflowed, overlapped, collidedTime warped itself into a liquid currentLaughter and pain, erratic, we sharedIn no set pattern, just the rhythm of lifeLife to be lived, to be loved, to be foundIn the everyday nothings that were our ownNo one else could give or take that lifeI learned from patience, actions and wordsToday a woman: confident, uncertain,Will leave with a shadow of your spiritFollowing your path, I make my ownJumping off the cliff, to either fly or fallForevermore(...)'
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For You (By Ankita Gaidhane)
Author
: Shalini Sharma
Blog
: Nutshell
Date
: 7/1/2012 10:40:00 PM
'Words overflowed, overlapped, collidedTime warped itself into a liquid currentLaughter and pain, erratic, we sharedIn no set pattern, just the rhythm of lifeLife to be lived, to be loved, to be foundIn the everyday nothings that were our ownNo one else could give or take that lifeI learned from patience, actions and wordsToday a woman: confident, uncertain,Will leave with a shadow of your spiritFollowing your path, I make my ownJumping off the cliff, to either fly or fallForevermore(...)'
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पैमाने
Author
: Shalini Sharma
Blog
: Nutshell
Date
: 6/9/2012 4:22:00 AM
'आज कि रात के बहाने बहुत, हमारी सुबह के ठिकाने बहुत ।था ख़ास दरमियाँ कुछ भी नहीं,पर मदहोशियो के सिरहाने बहुत ।।चंद लफ़ज़ो को पलको पे उठाये, देखे तुम्हारे नजराने बहुत।तुम्ही में संजोये गलियारे बहुत, तुम्ही में खोये चौबारे बहुत ।।किसी से तुम्हारी शिकायतें बहुत, तुम से हमारी ख्वाहिशें बहुत ।ऐसे बने अपने फ़साने बहुत, खामोशियो कि ज़बाने बहुत ।।बा मकसद दिल्लगी के निशाने बहुत, यूँ तो आये हमें भी समझाने बहुत ।पर दिल्लगो में इत्तेफाकी बहुत, और दिल कि लगी कि मिसाले बहुत ।।महफूज़ थी जो&nb(...)'
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टूटते मकान
Author
: Shalini Sharma
Blog
: Nutshell
Date
: 5/31/2012 3:34:00 AM
'बंद दरवाजो के सामनेआज पहरेदार हैं कईं |गारे मिटटी के इंसान,गारे मिटटी के मकान,इंसानो के भी;मकानो के भी;आज खरीदार हैं कईं |ठहरी सी, उलझी सी देहरी पर खड़ी है ज़िन्दगीकभी अन्दर पनपती थीआज बाहर सुलगती सी सिसकना भूलकर टूटते मकान के साथपीछे छूटते रिश्तो को ताकती छटपटाती, सीता अटपटे सवालो से झूझती,'कानून मेरे लिए? मैं कानून के लिए?या, मैं भी कानूनन ही हूँ, बस यूँ ही?'ना रोजी, ना रोटीऔर अब बाकी इंट पत्थर के निशाँ भी नहीं इस रामराज्य में, इंसान के कम कानून के सिपहसलार हैं कईं |Please se(...)'
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छिपकली
Author
: Shalini Sharma
Blog
: Nutshell
Date
: 5/25/2012 3:33:00 PM
'वो मचानजहाँ तुम चढ़े बैठे हो, उससे सब छोटा ही दीखता है,शायद ऐसा भी लगता होकि; सब तुम से ही हैजैसे कोई छिपकली हो,छत से ऐसा जुड़ाव कि गोल गोल आँखो का मुआयना खुद तक ही सीमित रहे'लगे कि वो नीचे उतरीदुनिया उथलपुथल हो जाए शायद;तुम्हे देखकर में सोचती हूँ;वो छिपकली कैसे होतीं हैं जो जमीन पर घूमती मिल जाती हैं,क्या वो अचानक जमीन पर गिर जाती हैं और उससे जुड़ जाती हैं?या कभी यूँ ही कुछ हो जाता है कि;छत से अपने जुड़ाव, उससे दूर होने के अलगाव को एक छलांग में भूल जाए,पैराशूट खुल जाए मानो,डर त्रिश(...)'
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स्याही ख़्वाब
Author
: Shalini Sharma
Blog
: Nutshell
Date
: 5/21/2012 1:52:00 AM
'लिखना तो बहुत कुछ थापर कैसे लिखूंकि ख़्वाबो कि स्याही काली क्यूँ है,क्यूँ नीले सुनहरे आसमानका रंग बर्फीला हो गया,कैसे धानी घासदूब से मुंह मोड़े है,और क्यूँ हर शरारतहर हरकत से हैरां ये शाम है?१९४७ में रंगीले ख्वाब जोहमने धानी घास से सुनहरे आसमान को देखते बुने थे;वो अब बर्फीली दूब के साथ इस शाम के हमसफ़र हैंऔर हम तुम जो हैं भी और नहीं भी,इन्हें देखते हैं और सोचते हैंक्या लिखे, किसे लिखे;क्यूंकि किसी क्रांतिकारी कि याद अबसहानुभुतिक अपराध है,नियामगिरि, जैतापुर, कून्दकुलम में सत्याग्रहरा(...)'
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किस्से
Author
: Shalini Sharma
Blog
: Nutshell
Date
: 5/3/2012 1:52:00 AM
'किस्से कैसे कहेकिसे कहें क्यूँ ?कबकिधर कटे कसे कसे किस्सेकसे कसे क्यूँ ?किससे कहें किधर कटे कटे किस्से कटे किससे क्यूँ ?कटे कटेकसे कसे किस्से क्या किससे कहें कहें क्याकब किससे कौनसे किस्से क्यूँ?'
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सब्र करो राधे आज
Author
: Shalini Sharma
Blog
: Nutshell
Date
: 4/9/2012 6:44:00 PM
'राधाजी अब तो, तुम ही कहो क्या राज?बोले थे कान्हा, कैसे, 'राधे, सब्र करो तुम आज'?राधाजी अब तो, तुम ही कहो क्या राज?सखी री तुम से, कैसे, कह दूं सारी बात?सब्र कि पाथी ना खोले ना बंद हो कान्हा कि बंसी थिरके जब मधुमाससखी री तुमसे, कैसे, कह दूं सारी बात?राधाजी अब तो, तुम ही कहो क्या राज़बोले थे कान्हा, कैसे, 'राधे, सब्र करो तुम आज'सखी री तुम से, कैसे, कह दूं सारी बात?लाज कि गठरी में बाँध के बैठी मतवाले मंझीरे का साज और कान्हा तुम्हारे कहते हैं मुझसे 'राधे, सब्र करो तुम आज' सखी री तुम से,(...)'
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retreat
Author
: Shalini Sharma
Blog
: Nutshell
Date
: 4/9/2012 12:53:00 PM
'seamlessly, easing out,invisiblyin times that will now reminisceof the time that passed bystrange pleasure in thisnot knowingnot seekinga collected self splintered now in multitudesshowing gravity its placeas i walk from this place to thatinsideoutsideyou were rightthere are many forms of retreatand mine beganwhile you were scribbling a discreet dream.'
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साहिब
Author
: Shalini Sharma
Blog
: Nutshell
Date
: 3/1/2012 3:01:00 AM
'कुछ इस अदा सेकहा उसने'काफ़िर हो तुम,तुम्हारा इरादा काफ़िर.आलिम सब हमारे,हमारे सब जाकिर'तंगदिल, निजाम की हरकतें ऐसीखुद साहिब के ईमान की सारी दलीलबेतासीरInspired by: The German's Hand. And the Doctor's Googly'
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letters
Author
: Shalini Sharma
Blog
: Nutshell
Date
: 2/18/2012 2:36:00 AM
'lettersthat i write for himyou write for herand we read for each other.lettersthat never reached himthat never reached herand we kept together.letterswe closeto throw somedaylettersthat we now gather.'
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कोहरा
Author
: Shalini Sharma
Blog
: Nutshell
Date
: 1/22/2012 2:04:00 AM
'ये वो पहर है,जब कोहरा पुकारता,कुछ नयी है छूहन, कुछ कहीं छूटता,दम बा दम क्या कहें;सूरजमुखी सा चाँद है, हर पहल में छुपी, एक सुबह,एक शाम है...'
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नदी में तलब है?
Author
: Shalini Sharma
Blog
: Nutshell
Date
: 12/29/2011 5:24:00 PM
'हाँनदी में तलब है,धुंध बन शाखों पर सो जाने कि;जो है भी और नहीं भी,फिर आगोशबंदअज़ल उस लम्हे में खो जाने कि;जो हाज़िर भी हो और नाज़िश भी...'
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क्या होता है
Author
: Shalini Sharma
Blog
: Nutshell
Date
: 12/23/2011 3:48:00 AM
'बेखबर रात काओस में ढल जानाज़र्र ज़र्र करती हवा काउन्नींदा पालने को हिलानाआलसी आँखों का खुलनाऔर उस बूढी माई को सामने पानाजिसने नर्बदा की घाटी मेंटकटकी बाँध कहा थागाँव से मत जानाक्या होता है?'
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