सैलाब...
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: Prakash Jain
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: Prakash प्रकाश
Date
: 5/25/2013 10:54:00 AM
'मन में सैलाब बहता- उफनता रहा है धैर्य ना जाने क्यूँ फिर पनपता रहा है सोचा जहाँ कहीं भी बस, ठहर जाने को वक़्त अचानक सिकुड़ता- सरकता रहा है करेंगे इबादत पर ना मोहब्बत किसी से मौसम ख्यालों का दिनों-दिन बदलता रहा है परेशानियाँ आती जाती रही यूँही निरंतर जीवन हर बार बिखरता - संभलता रहा है न फिक्र-सोच कल की, न मंथन, विचार विपरीत ही अक्सर जब होता - चलता रहा है मन (...)'
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CKD से CCD... C-चाय K-की D-दुकान से Cafe Coffee Day
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: Prakash Jain
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: Prakash प्रकाश
Date
: 3/31/2013 1:47:00 PM
'CKD से दुनिया मुड़ी अब CCD की ओर कटिंग नहीं मिलती यहाँ, पॉकेट कटती है Sure बातें जो गप भी कहलाई, यहाँ बनी वो Gossipचुक्कड़-ग्लास बने Mug, चुस्की कहलाये है Sip अड्डेबाजी जो कहलाती थी, यहाँ बनी NetworkSocial, Professional, कहीं Virtual सम्पर्क अंग्रेजीपना यहाँ हरतरफ बातों में छलकता है चीनी का चम्मच पहले, अब Sugarbag बन मिलता है वक़्त बदलता है, बदलते हैं हम, और तौर- तरीके मिलना-जुलना पर जरुरी, भले बदले(...)'
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उदास रहते हैं अक्सर...
Author
: Prakash Jain
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: Prakash प्रकाश
Date
: 3/24/2013 2:30:00 PM
'Autumn in Ladakh - Image Courtesy: Harshal Jariwalaउदास रहते हैं अक्सर कभी आप किसीसे तो कभी कोई आपसे रूठना, मनाना चिढना, कभी चिल्लानाबेवजह का गुस्साखुद ही में झुँझलाना यही उदासी फिर निराशा बन जाती है ये होता है हरदम कि जहाँ प्यार गहरा हो सम्बन्ध हो भावुक,मेल-जोल गहरा हो आशाएं और अपेक्षाएं इस पुरे फसाद की जड़ है पर इनका नियंत्रण मुश्किल है शायद, ये मनुष्य की प्रकृति है क्षणिक ही सहीप(...)'
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प्यार आजकल बड़ा Practical हो गया है...
Author
: Prakash Jain
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: Prakash प्रकाश
Date
: 2/11/2013 2:13:00 PM
'Frank हो गया है, Selfish हो गया है, प्यार आजकल बड़ा Practical हो गया है... ना Dependence किसी पे; ना ही Expectation की बातें,Pairing का है जमाना, Bluetooth जम गया है...प्यार आजकल बड़ा Practical हो गया है... Flirting है कहीं ये; कहीं Intimate मस्ती, तो कहीं बस Bills चुकाने का; Resource हो गया है... प्यार आजकल बड़ा Practical हो गया है... एक, दो, तीन, नया Affair नये दिन; SMS, wassup, call ,mail(...)'
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पेड़ चल रहे हैं...
Author
: Prakash Jain
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: Prakash प्रकाश
Date
: 2/2/2013 3:50:00 PM
'पेड़ चल रहे हैं कभी भागे जा रहे हैं दूर कोरे मैदानों में,खेतों में कहीं तैयार फसल तो कहीं लंबी मेड़ें मानो किसीने मैदानी चित्रकारी की हो तभी नज़र आया बैलों के साथ खेत जोतता किसान याद दिला गया की हमारा देश कृषिप्रधान है कुछ पहाड़ भी आये-गये बड़ी तेजी से पर उनकी स्थिरता दूर तक दिखाई देती रहीकहीं-कहीं बड़े पत्थरों पर बिना किसी सहारे टिके पत्थर बड़े हतप्रभ करनेवाले थे नदियाँ, तालाब, पोखरे और (...)'
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Lets Fly High...:-)
Author
: Prakash Jain
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: Prakash प्रकाश
Date
: 1/14/2013 1:53:00 AM
''
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धागे ख्यालों के, उलझे-उलझे से...
Author
: Prakash Jain
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: Prakash प्रकाश
Date
: 1/6/2013 5:29:00 PM
'धागे ख्यालों के, उलझे-उलझे से कई गाँठें भी बन चुकी है इनमें कुछ जानेंकुछ अनजानें सुलझाते- सुलझाते गाँठें क्रोध की, नफरतों की रुढियों की, भ्रांतियों की अजीबोगरीब आस्थाओं की सुलझानें का हर प्रयास और उलझनें जैसा है एक नुकीली सुई सी हमेशा चुभती है जिसे सिर्फ महसूस किया जाता हैछोर लम्बा बड़ा मिलता नहीं इन धागों का न ही छिद्र मिले इस सुई काख्यालों की ये उलझन शायद, ज़िन्दगी के सुलझने,और उसे समझन(...)'
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कभी बातें होती थी रोजाना...
Author
: Prakash Jain
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: Prakash प्रकाश
Date
: 12/29/2012 1:07:00 PM
'Photo by : Jinit Soniकभी बातें होती थी रोजाना अब आहटें सालाना कि न बदले हैं हम, न बदला है तू शायद पर कितना बदल गया है ज़माना कि लम्हा वो ठहर गया होता थोडा जी लेते और ज्यादा क्या होता ?माहोल कुछ और ही होता इस आज में न इस तरह होता जिक्र न पड़ता बतियाना कभी बातें होती थी रोजाना... '
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चलो फिर नये से शुरू करते हैं...
Author
: Prakash Jain
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: Prakash प्रकाश
Date
: 11/12/2012 4:19:00 AM
'चलो फिर नये से शुरू करते हैं एक शहर नया, एक बस्ती नयी एक मकान नया सा चुनते हैं कि नयी बस्ती- मकान में बातें पुरानी करते हैं। चलो फिर नये से शुरू करते हैं...नय़े चेहरे, नये लोगों में साथ नया सा ढूंढते हैं उन लम्हों में खुद को यादों से बचाया करते हैं। चलो फिर नये से शुरू करते हैं... सामान बिटोरा,सारा बोरिया-बिस्तर, ले आये सारा नए शहर ये नया मकां कभी घर होगा इस आस सजाया(...)'
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सुबह थोड़ी सी अलसाई होगी
Author
: Prakash Jain
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: Prakash प्रकाश
Date
: 10/17/2012 2:36:00 PM
'A Painting by Raja Ravi Verma नूर आज फिर चेहका होगा सुबह थोड़ी सी अलसाई होगी किरणें पर्दों की जालियों से छनकर तुम्हे छुकर थोडा इतराई होगी गुनगुना रही होगी तुम वो गीत वो थोड़े हमारे सेख्यालों के शीतल पानी से अलमस्त नहायी होगी वो भीनी जुल्फें तुम्हारी उलझी ज़िन्दगी सी हमें ही सोचते हुए सुलझाई होगी आँखें खोई सी ख्वाब बुनने में आइना देख थोडा शरमाई होगी होठ सुष्क, हंसी चेहरे पर आभा हरतरफ जगमग(...)'
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पैसे पेड़ों पे उगते जो...
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: Prakash Jain
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: Prakash प्रकाश
Date
: 9/25/2012 1:25:00 PM
'पैसे पेड़ों पे उगते जो कितनी खुशहाली होतीहर सख्स बनाता बगीचे हर तरफ हरियाली होती ना महंगाई पे दुःख होता ना कम आमदनी का रोना लोग रहते भी इन पेड़ो पे जंगल भरता हर कोना गरीब कहीं ना ढूंढे मिलते अमीर बनता हर जन-मन न घोटाले, न भ्रष्टाचार न काला होता गोरा धन पर इसमें भी ये नेता अपना लोहा मनवातेअन्न उगाने पर प्रतिबन्ध पैसों के पेड़ लगवाते विदेशी निवेश फिर इन बगीचों में भी मंगवाते बाकि इनमे(...)'
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कमबख्त नौकरी, जीवन की एक मज़बूरी
Author
: Prakash Jain
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: Prakash प्रकाश
Date
: 9/22/2012 12:55:00 PM
'ये ऊँची फंडू बातों में, कडवी तीखी सच्चाई मुख पर होती तारीफें, पीछे से खूब खिंचाई चापलूसी, चमचागिरी, कहीं हुस्न पे झुकाव अँधा भरोसा कहीं पर, कहीं हर बात में टकराव कहीं इर्ष्या, कहीं जलन, आपस में खिंचा-तानी राजनीति, कूटनीति, और साथ मिले बेईमानी जिक्र तनखा का हो, वो चुनावी लुभाते वादेप्रमोसन में बरसों, इन्क्रीमेंट चंदों से आते ये रोज नये से टार्गेट, साहब की जी-हुजूरी कमबख्त नौकरी, जीवन की एक मज़बूरी Theme Suggested By: Mr(...)'
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चाय से चाहत जुडी...
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: Prakash Jain
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: Prakash प्रकाश
Date
: 9/15/2012 1:54:00 PM
'चाय से चाहत जुडीकुछ को बस लगावकुछ के लिए नशा सा हैना छुटे लाख उपाय कहीं अदरकी, कहीं इलाची कहीं खड़ी, कहीं कड़क लोकप्रियता इससे जुडी हर नुक्कड़, हर सड़क दिन के हर प्रहार का है इससे सीधा सा नाता सुबह सुबह हो बेड-टीतो बिस्तर छूट पाता ऑफिस में महबूब सा चायवाले का इंतज़ारकब आये, थोडा मूड बने हो थोड़ी गप-सप दो चार घंटो चलती मीटिंग्स होहो भाषण, ट्रेनिंग, सेमीनार टी ब्रेक ही बनता है हरदम सरदर्द का उपचारवो इम्तिहान, व(...)'
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दोस्त खुद ही के होकर देखिये...
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: Prakash Jain
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: Prakash प्रकाश
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: 8/19/2012 8:07:00 AM
'आत्मीयता स्वयं से कर के देखियेदोस्त खुद ही के होकर देखिये कि साथ भी मिलेगा, सहारा भी थोड़े मन के होइये, खुद को टटोलियेआसान लगेगी ज़िन्दगी की कसौटियाँपरिवर्तन होगा महसूस कर के देखिये दोस्त सच्चे मिलेंगे चंद ढूंढे पर खुद सा सच्चा कोई कहाँ, ये तो सोचिये दोस्त खुद ही के होकर देखिये The thought here of "friendship with self" is inspired and further carried forward from a reading on Jain Darshan and also is rooted in Bhagwad Gita. '
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अभिनेता बहुत हुए, थोड़े नेता भी चुन लो
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: Prakash Jain
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: Prakash प्रकाश
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: 7/31/2012 1:29:00 AM
'हे यमदेव ! विनम्र प्रार्थना हमरी ये सुन लो अभिनेता बहुत हुए, अब थोड़े नेता भी चुन लो मृत्यु इन्हें देने का एक अभियान चलाओ पहले पहल सारे भ्रस्टाचारियों को बुलाओ दुसरे चरण में दलबदलू-मौकापरस्त ले जाओ तीसरे चरण में जातिवादीयों की हो बारी अंत में जीवन-मुक्त करो, सब मजहबी-चोलाधारीहो सकता है बढ़ जाए संख्या तुम्हारे डेरे में उपाय एक ये भी है कुछ को दे दो बिमारीएक सहायता तुम्हारी बस, अदभुत परिवर्तन लायेगी न्यायालय बस न्याय करेंगे, पुलिस जन सुरक्षा में लग जायेगी , ना अनशन, ना विरोध हो(...)'
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एक चेहरे में कई चेहरे छुपाते हैं लोग ...
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: Prakash Jain
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: Prakash प्रकाश
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: 7/8/2012 4:56:00 PM
'कहते-कहते ही संभल जाते हैं लोग पलक झपकते ही बदल जाते हैं लोगकितना आसान है झूठ कहना-सुननापकडे जाने पे, सकपकाते हैं लोग स्वार्थी ये दुनिया, रिश्ते-नाते समाजअचानक ही अपनापन जताते हैं लोग बेवकूफ पैदा ही नहीं होते अब जहाँ मैं चालाकी खून में ही अब पाते हैं लोग कौन सच्चा, कौन झूठा, समझे कोई कैसेएक चेहरे में कई चेहरे छुपाते हैं लोग होड़ लगी है सबमें कुछ कर दिखाने की इसीमें रास्ता थोडा सा भटक जाते हैं लोग एक खोज ही होगा मनुष्य को समझना इन्ही कोशिशों में आते, चले जातें हैं लोग...'
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गिरते हौसलों को संभाला है बहुत...
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: Prakash Jain
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: Prakash प्रकाश
Date
: 7/4/2012 1:36:00 PM
'गिरते हौसलों को संभाला है बहुतअंधेरों में भी कहीं उजाला है बहुतरूठे ज़िन्दगी से, हालातों से अक्सर आंसुओं को बहने से, टाला है बहुतरंगीली दुनिया, क्या खूब लोग हैं गोरे चेहरों में मन, काला है बहुत चाह कर भी ना समझ पाए इनको हर एक इन्सां यहाँ निराला है बहुत सपने देखते हैं, देखना जरुरी है इरादों में पर भरा अटाला है बहुत चुनौतियाँ आती रही, जाती रही खुद को हर तरह से, ढाला है बहुत गिरते हौसलों को संभाला है बहुत...Image Courtesy: Mr(...)'
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शौचालय या सोचालय... एक हास्य व्यंग
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: Prakash Jain
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: Prakash प्रकाश
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: 6/10/2012 11:31:00 AM
'सोच शौचालयों में खिलती है ना जाने कितने अविष्कार हुवे यहाँ सेमनुष्य की वैचारिक क्षमता यहाँ शीर्ष स्थान पर होती है ये वो शांति का केंद्र है जहाँ मनुष्य खुद को खुद के करीब पाता है और यही करीबी विचारों-चिन्तनों का रूप लेती है शौचालयों के अदभुत प्रयोग होते हैं कुछ महानुभाव यहाँ समाचार पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ लेते हैं इस वक़्त वे देश और दुनिया पर गहन सोच करते हैं कुछ बस ख्यालों में खोये से ना जाने कितने दृश्य देख लेते हैंनई पीढ़ी यहाँ से दूर संचार के आश्चर्यजनक प्रयोग करती है कोई लम्बी बातें,(...)'
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बड़े गिरगिटीया हैं हम...
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: Prakash Jain
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: Prakash प्रकाश
Date
: 5/31/2012 4:21:00 PM
'बड़े गिरगिटीया हैं हम,कितने रंग बदलते हैं... कमबख्त मौसम, माहोल,सब फ़िज़ूल है इंसानी रंगों में... अभी कुछ पल पहले ही जो मुस्कुरा रहे थे अब आग उगल रहे हैं जोरो चिल्ला रहे हैं की दूजे ही पल शांतख्यालों में खोये से पलक झपकी नहीं कीकी मन ही मन बडबडा रहे हैं तारीफ कर भी दी किसी की कहीं माहोल बदला, अपशब्द बरसा रहे हैं कभी कोसे खुद को, कभी औरों को बेचैन से हैं, थोड़े पगला रहे हैं मजाकिया मिजाज़ कहा जाता है पर (...)'
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चाहने से क्या होता है...
Author
: Prakash Jain
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: Prakash प्रकाश
Date
: 5/19/2012 9:34:00 AM
'दिल चाहता हैपर चाहने से क्या होता है ?अकेलापन कोई आदत नहीं होती पर हर मोड़ अकेला होता है...... हम कह भी दें की मौसम है आशिकाना पर भला कहने से, कहाँ होता है ?ये इश्क एक बीमारी, हर कोई है रोगी इन रोगों का कहाँ इलाज़ होता है ?कहीं हंसी है इसमें, तो कहीं नमी सी है कुछ कहते है फैसला, तकदीरों से होता है दिल चाहता हैपर चाहने से क्या होता है...?'
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