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आध्यात्मिक विचार - 01-05-2013

Author : Ravi Kant Sharma      Blog : बृज अमृत-वाणी      Date : 01-05-2013 16:38:00

'मनुष्य जीवन लक्ष्य भक्ति-पथ की प्राप्ति।व्यक्ति को भावनाओं के अधीन न होकर भावनाओं को अपने आधीन रखने का प्रयत्न करना चाहिये।जो व्यक्ति अपनी भावनाओं को अपने वश में रखकर कर्तव्य-कर्म करता है, केवल वही व्यक्ति भक्ति पथ की ओर अग्रसर हो पाता है। '

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आध्यात्मिक विचार - 20-04-2013

Author : Ravi Kant Sharma      Blog : बृज अमृत-वाणी      Date : 20-04-2013 04:50:00

'विशुद्ध प्रेम से ही परमात्मा की प्राप्ति संभव।विशुद्ध प्रेम न तो बढ़ता है और न ही घटता है, जो प्रेम बढ़ता है वह "राग" होता है और जो प्रेम घटता है वह "द्वेष" होता है। जिस व्यक्ति का न तो किसी वस्तु से "राग" होता है और न ही किसी वस्तु से "द्वेष" ही करता है, ऎसा सम-भाव में स्थित व्यक्ति ही परमात्मा को प्राप्त होता है।'

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आध्यात्मिक विचार - 05-03-2013

Author : Ravi Kant Sharma      Blog : बृज अमृत-वाणी      Date : 05-03-2013 02:45:00

'प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य आनन्द की प्राप्ति होता है।वर्तमान में किये हुए कर्म से ही भविष्य का निर्माण होता है, जो व्यक्ति वर्तमान में मन को स्थिर रखकर कर्म करता है उसी व्यक्ति को भविष्य में आनन्द की प्राप्ति संभव होती है।'

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आध्यात्मिक विचार - 17-02-2012

Author : Ravi Kant Sharma      Blog : बृज अमृत-वाणी      Date : 17-02-2013 02:56:00

'प्रत्येक मनुष्य का धर्म, व्यक्तिगत होता है। भगवान के आश्रित होकर अपने धर्म का निरन्तर आचरण करने वाले व्यक्ति को शीघ्र ही भगवान की भक्ति प्राप्त हो जाती है। '

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आध्यात्मिक विचार - 14-02-2012

Author : Ravi Kant Sharma      Blog : बृज अमृत-वाणी      Date : 14-02-2013 01:57:00

'मन में सद्‍विचार रखने से, वाणी से सत्य बोलने से और शरीर से सत्कर्म करने से ही धर्म का आचरण संभव होता है।  '

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आध्यात्मिक विचार - 02-01-2012

Author : Ravi Kant Sharma      Blog : बृज अमृत-वाणी      Date : 02-01-2013 05:45:00

'कर्म से ही कर्म के बंधन की उत्पत्ति होती है, कर्म से कर्म के बंधन से मुक्ति प्राप्त होती है। साक्षी भाव में स्थित होने पर ही प्रत्येक व्यक्ति का कर्म-बधंन से मुक्त होना संभव होता है।  '

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आध्यात्मिक विचार - 23-12-2012

Author : Ravi Kant Sharma      Blog : बृज अमृत-वाणी      Date : 23-12-2012 04:51:00

'पुरुषार्थ से ही लक्ष्य की प्राप्ति संभव होती है। प्रत्येक व्यक्ति को पुरूषार्थ के साथ-साथ प्रभु की भक्ति का सहारा भी अवश्य लेते रहना चाहिये, क्योंकि प्रभु की भक्ति से ही मन की शुद्धि संभव होती है और मन की शुद्धि होने पर ही विषय-आसक्ति का त्याग संभव होता है।विषय-आसक्ति के त्याग होने पर ही परम-लक्ष्य आनन्द स्वरूप कृष्णा की प्राप्ति संभव होती है। '

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आध्यात्मिक विचार - 16-12-2012

Author : Ravi Kant Sharma      Blog : बृज अमृत-वाणी      Date : 16-12-2012 05:36:00

'प्रत्येक व्यक्ति को जीवन में,भोजन वही करना चाहिये, जिसको शरीर पचा सके।बोलना केवल वही चाहिये, जिससे हर कोई रीझ सके॥सम्बन्ध वही बनाना चाहिये, जितना स्वंय से निभ सके।सुनना केवल वही चाहिये, जिसका स्वयं से आचरण हो सके॥'

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आध्यात्मिक विचार - 12-12-2012

Author : Ravi Kant Sharma      Blog : बृज अमृत-वाणी      Date : 12-12-2012 05:34:00

'खोने का ड़र क्यों?जो वस्तु जिस व्यक्ति के उपयोग की है उस वस्तु का अन्य कोई उपयोग नहीं कर सकता है, और जो वस्तु जिस व्यक्ति के उपयोग की नहीं है उस व्यक्ति की कोई ताकत नहीं है कि वह उस वस्तु का उपयोग कर सके।'

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आध्यात्मिक विचार - 11-12-2012

Author : Ravi Kant Sharma      Blog : बृज अमृत-वाणी      Date : 11-12-2012 07:50:00

'जिस प्रकार जब पानी शान्त हो जाता है तो आइना हो जाता है, उसी प्रकार जब व्यक्ति का मन शान्त हो जाता है तो मानव जीवन का परम-लक्ष्य आनन्द स्वरूप कृष्णा मिल जाता है।'

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आध्यात्मिक विचार - 11-12-2012

Author : Ravi Kant Sharma      Blog : बृज अमृत-वाणी      Date : 11-12-2012 07:45:00

'जिस प्रकार जब पानी शान्त हो जाता है तो आइना हो जाता है, उसी प्रकार जब व्यक्ति का मन शान्त हो जाता है तो आनन्द स्वरूप कृष्णा मिल जाता है।'

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आध्यात्मिक विचार - 01-11-2012

Author : Ravi Kant Sharma      Blog : बृज अमृत-वाणी      Date : 01-11-2012 06:26:00

'संसार एक खेल का मैदान है, जीवन एक खेल है, प्रत्येक जीव यहाँ एक खिलाड़ी है।जो मनुष्य इस जीवन रूपी खेल के नियमों को जानकर इस खेल को खेलता है वही व्यक्ति बुद्धिमानों में श्रेष्ठ होता है।'

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आध्यात्मिक विचार - 21-10-2012

Author : Ravi Kant Sharma      Blog : बृज अमृत-वाणी      Date : 21-10-2012 02:05:00

'प्रत्येक व्यक्ति केवल स्वयं की भावना को ही पहचान सकता है। जो व्यक्ति समझाने की भावना से पढ़ता, लिखता, सुनता या बोलता है वह मूर्ख होता है। जो व्यक्ति समझने की भावना से पढ़ता, लिखता, सुनता या बोलता है वह बुद्धिमान होता है।'

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आध्यात्मिक विचार - 15-10-2012

Author : Ravi Kant Sharma      Blog : बृज अमृत-वाणी      Date : 15-10-2012 03:11:00

'स्वयं को प्राप्त जानकारी को पूर्ण जानकारी समझना प्रत्येक व्यक्ति की कमजोरी होती है।जो व्यक्ति अपनी इस कमजोरी को दूर कर लेता है, वह व्यक्ति बुद्धिमानों में श्रेष्ठ होता है। '

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आध्यात्मिक विचार - 13-10-2012

Author : Ravi Kant Sharma      Blog : बृज अमृत-वाणी      Date : 13-10-2012 04:40:00

'मनुष्य जीवन का गुजरा हुआ प्रत्येक क्षण शिक्षा देता है। स्वयं के अनुभवों से सीख न लेना ही मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी होती है।जो व्यक्ति इस कमजोरी को दूर कर लेता है, वही व्यक्ति बुद्धिमानों में श्रेष्ठ होता है।'

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Author : Ravi Kant Sharma      Blog : बृज अमृत-वाणी      Date : 10-10-2012 02:17:00

'व्यक्ति जैसी संगति करता है वैसे ही विचार बुद्धि में उत्पन्न होते हैं, वैसा ही स्वभाव हो जाता है और वैसा ही कर्म स्वतः ही होने लगता है। '

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आध्यात्मिक विचार - 11-9-2012

Author : Ravi Kant Sharma      Blog : बृज अमृत-वाणी      Date : 11-09-2012 03:03:00

'जो व्यक्ति दूसरों को समझाने का भाव रखता है, वह व्यक्ति स्वयं को कभी समझ नहीं पाता है।'

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आध्यात्मिक विचार - 1-9-2012

Author : Ravi Kant Sharma      Blog : बृज अमृत-वाणी      Date : 01-09-2012 05:47:00

'शिष्य भावना में भली प्रकार स्थित व्यक्ति ही सदैव दूसरों के लिये एक अच्छा गुरु होता है।'

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आध्यात्मिक विचार - 21-8-2012

Author : Ravi Kant Sharma      Blog : बृज अमृत-वाणी      Date : 21-08-2012 02:58:00

'सभी जीवात्मायें नित्य मुक्त हैं। जीवात्मा स्वयं को शरीर समझने के कारण ही मोहग्रस्त हो जाती है, मोहग्रस्त जीवात्मा कर्म बन्धन में स्वयं ही बँध जाती है। जिस जीवात्मा को स्वयं के वास्तविक स्वरूप का अनुभव हो जाता है वह जीवात्मा शरीर में रहते हुए भी कर्म के बन्धन से मुक्त रहती है। '

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आध्यात्मिक विचार - 19-8-2012

Author : Ravi Kant Sharma      Blog : बृज अमृत-वाणी      Date : 19-08-2012 02:14:00

'परमतत्व की प्राप्ति तत्वज्ञान से होती है, तत्वज्ञान की प्राप्ति मोह के मिटने पर होती है, वस्तु वैराग्य से मोह मिटता है, वस्तु वैराग्य केवल सत्संग से ही संभव है। '

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