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चलते-चलते आखिरी सलाम हो जाए...(ग़ज़ल)

Author : हरीश जयपाल माली      Blog : हरीश... वर्तमान की परछाई      Date : 27-05-2012 04:34:00

'इस जिंदगी के नाम इक जाम हो जायेकुछ रात मयखाने में आराम हो जायेहम उनसे ये कहकर घर से निकले थे इंतजार ना करना चाहे शाम हो जाए वो इतना हसीं है की गम न होगा गरउससे मुहब्बत करके बदनाम हो जाए क्यू करे मुहब्बत छुप-छुपकर जहाँ से हर राज बेनकाब सरे-आम हो जाए इक मुलाकात उनसे जरुरी है 'हरीश' चलते-चलते आखिरी सलाम हो जाए'

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इक कसम ऐसी भी अब खा ली जाये (गज़ल)

Author : हरीश जयपाल माली      Blog : हरीश... वर्तमान की परछाई      Date : 26-05-2012 07:31:00

'इक कसम ऐसी भी अब खा ली जाये जिससे दोस्ती-दुश्मनी संभाली जाये टूटी तस्वीर से आंसू टपकते देखकर किसी कलंदर की दुआएं बुला ली जाये अब कोई ताल्लुक न रहा उसका मुझसेहो सके इश्क की अफवाहें दबा ली जाये खबर है तूफां जानिबे-समंदर निकले हैं वक़्त पर टूटी कश्तियाँ सजा ली जाये इन्तजारे-यार की भी हद होती है'हरीश'थकी आँखें इक रात को सुला ली जाये '

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चाँद भी तेरे हुस्न का गर दीवाना हो जाये (जिन्दा ग़ज़ल)

Author : हरीश जयपाल माली      Blog : हरीश... वर्तमान की परछाई      Date : 23-05-2012 16:43:00

'मुहब्बत का तिलिस्मी अफ़साना हो जाये चाँद भी तेरे हुस्न का गर दीवाना हो जाये इस नादान दिल को सुकूँ भी मिल जायेगा  हर रोज तेरा मेरे घर आना जाना हो जाये ये लंबा सफ़र है जीने का आखरी सांस तक  जिंदगी को लम्हों के बांटकर जीना हो जाये अब मजे की बात नहीं रही तेरी मुहब्बत में हो सके तो तेरा रूठना मेरा मनाना हो जाये खुद के साये पर हरगिज़ एतबार न करो 'हरीश'अँधेरे में हमें रुकना हो तो ये रवाना हो जाये '

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मुहब्बत भी एक किस्म की फकीरी है जनाब (ग़ज़ल)

Author : हरीश जयपाल माली      Blog : हरीश... वर्तमान की परछाई      Date : 22-05-2012 12:17:00

'मुहब्बत भी एक किस्म की फकीरी है जनाबफुरकते-महबूब में तड़पना मझबूरी है जनाब सूखे पत्तों की खबर अंधड़-तूफानों से पूछिये बेसहारा जिंदगी की हर सांस आखिरी है जनाब वो कहते रहे गैरों से दिल की बाते रो-रो कर जैसे इश्क की बातों में अश्क जरुरी है जनाब ये चाँद ये सितारे ये जमीं आसमान हर कोई अहसास की हवा में जिन्दा शरीरी है जनाब गैरों  के घर का ठिकाना मत पूछिये 'हरीश' रस्मे-तोहिन इस शहर में अब जरुरी है जनाब'

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शायरी-शायरी खेल बनाम शायर का इम्तिहान...

Author : हरीश जयपाल माली      Blog : हरीश... वर्तमान की परछाई      Date : 21-05-2012 06:20:00

'दोस्तों!ग़ज़ल सूफी फकीरों की दौलत है जो शायरों को विरासत में मिली है। ये जागीर ही ऐसी है जिसे हर कोई अपनी मुहब्बत और गमदीदा माहौल में इस्तेमाल करता है। मुहब्बत-गम और शायरी इस जहाँ की एक अटूट तिगडी है जिसकी खूबसूरती का चर्चा वक़्त की पगडंडियों पर सरे-राह होता रहा है...।              आज अलसुबह हमारा नादाँ दिमाग एक शरारत कर गया और हमें ये ख्याल दे गया की क्यों न आप जैसे फनकारों के साथ एक अल्फाजों का खेल खेला जाय। यह खेल ब(...)'

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खुबसूरत हो तुम (ग़ज़ल)

Author : हरीश जयपाल माली      Blog : हरीश... वर्तमान की परछाई      Date : 19-05-2012 03:49:00

'नकाब में हुस्न की मूरत हो तुमरंगे-खुशबू सी खुबसूरत हो तुमजिंदगी की बेनजीर जागीर हो किसी गरीब की दौलत हो तुम हो उजली ठंडी बूंद बारिश की बंजर जमीं की जरुरत हो तुम बुरा मानने का जिक्र क्यों करूंमीठी-मीठी सी शरारत हो तुम दर्द का दरिया सुकूं का साहिल कश्ती में बिखरी मुहब्बत हो तुम जुल्फों के साये में खुशबू के घरचांदे-पूनम सी खुबसूरत हो तुम यूँ कैसे भुला दूं तुम्हे मैं  'हरीश'रूठी ही सही मेरी किस्मत हो तुम'

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उसका रूठ जाना तबाही से कम नहीं (ग़ज़ल)

Author : हरीश जयपाल माली      Blog : हरीश... वर्तमान की परछाई      Date : 18-05-2012 16:06:00

'उसका  रूठ  जाना  तबाही से कम नहींलिबासे-ख़ामोशी झूठी गवाही से कम नहीं अब न रोना है उसका  न खिलखिलानावो गुजरे लम्हे भी  शायरी से कम नहीं तमाम उम्र भी कम है  शिकवों के लिए जिंदगी के शिकवे  जिंदगी से कम नहींपंछी  भी उड़ते-उड़ते  दम तोड़ देते है आसमां की कीमत  जमीं से कम नहींअकसर वही बात  लोग किया करते है जो मुहब्बत की  कहानी से कम नहीं ख्वाब में खुदा भी मुझसे कह गया'हरीश'मेरी बंदगी भी   तेरी बंदगी से कम नहीं'

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जिन्दा हूँ मगर आज भी

Author : हरीश जयपाल माली      Blog : हरीश... वर्तमान की परछाई      Date : 17-05-2012 07:25:00

'जिन्दा हूँ मगर आज भी गम के लिबास में बिखरी हुई कहानियाँ जिस्मे-अलफ़ाज़ में आखिरी ख्वाहिश ये मेरी नाम-ऐ-साकी है तमाम  ईंट-ऐ-कब्र  नहला  दो  शराब मेंन जाने किसके गले से आगाज़-ऐ-क़त्ल हो बेहिसाब फिक्रमंद है लोग बिखरी कतार में ख़त्म हो भी तो कैसे हो परेशानियां  'हरीश'हर  सवाल  गमदिदा है  तेरे हर  जवाब में '

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जिंदगी जीने के जो आसां तरीके है (इक नादाँ ग़ज़ल)

Author : हरीश जयपाल माली      Blog : हरीश... वर्तमान की परछाई      Date : 12-05-2012 15:10:00

'जिंदगी जीने के जो आसां तरीके है मौत की चौखट पे मुद्दतों से सीखे है तू ही था जिस पर मुझे नाजिश था कभी आज तेरे ख्याल भी खामोश फीके है होश में रहना गज़ब हुनर की बात है इश्क की शराब जो हम पी के बैठे हैं परेशाँ है बादशाहों के महल घर-बार  बेफिक्र चैन-औ-सुकूँ से फकीर लेटे है क्या खूब सिखा हैं सलीका बंदगी का ऐ'हरीश'महबूब के पैरों की धुल सर पर उन्डेले है नाजिश =गर्व'

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नफरतों की गुस्ताखी (ख्वाबों से बनी गजल)

Author : हरीश जयपाल माली      Blog : हरीश... वर्तमान की परछाई      Date : 12-05-2012 14:59:00

'जिंदगी के मसलों की ज़ीनत जरुरी है जागीरे-बख्शीस की कीमत जरुरी है...नफरतों की गुस्ताखी हर रोज करता हूंमुहब्बत करने को तो फुर्सत जरुरी है... जंग का मैदान जख्मे-जमीं हो गया अब अमनौ-चैन की हरकत जरुरी है...आँख का मतलब नहीं हर वक़्त रोया जाय अश्क की बारिश को फुरकत जरुरी है... मुहब्बत का खेल तू न खेल पायेगा'हरीश'इस हुनर के खेल में शौहरत जरुरी है...जिंदगी के मसलों की ज़ीनत जरुरी है जागीरे-बख्शीस की कीमत जरुरी है...'

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बेक़सूर निगाहों के मसलें (ग़ज़ल)

Author : हरीश जयपाल माली      Blog : हरीश... वर्तमान की परछाई      Date : 10-05-2012 14:54:00

'बेक़सूर निगाहों के मसलें चश्मदीद गवाह हो गये हम इतना डूबे उसकी चाहत में कि दरिया हो गये मुहब्बत की बाँहों में सिसककर गम शुकून पाता है अश्कों में नहाकर बेआबरू  तमाम शिकवा हो गये एक बार जो उसकी खैर ली तो वो लिपट के रो पड़ा बातों बातों में हम भी गमे-यार के हिस्सेदार हो गये हर पत्थर को खंगालने की जब-जब भी चली है बात जाने क्यूँ बेबुनियाद मेरे शहर के मकां परेशां हो गये अकसर सूखे पत्ते उसी सिम्त फेंक दिए ज(...)'

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खुशबू का आलम जारी है (ट्विटर पर लिखी मेरी ग़ज़ल)

Author : हरीश जयपाल माली      Blog : हरीश... वर्तमान की परछाई      Date : 09-05-2012 13:32:00

'तुझसे बेपनाह मुहब्बत की ये कारगुजारी है नादाँ बस्ती में जनाजा-ऐ-महबूब की तैयारी है तुझे भूल भी जाऊं मगर आज ये हालात है मेरे बिखरी जुल्फों में भी खुशबू का आलम जारी है बेफिक्र बस्ती में इक फकीर धुनी तपा के बैठ गया बेसुध खुदा को पाने की उसकी पुरजोर तैयारी है कुछ न कहना उसे वो हर बात का बुरा मानती है वो गज़ब की बेशकीमती है वो खुदा की दुलारी है खेल-ऐ-मुहब्बत में खबरदारी भी जरुरी है 'हरीश'इसमे जीत भी करारी है इसमे (...)'

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एक कहानी ऐसी हो (ऐतिहासिक ग़ज़ल)

Author : हरीश जयपाल माली      Blog : हरीश... वर्तमान की परछाई      Date : 08-05-2012 13:05:00

'कोरे पन्नों की किस्मत में एक कहानी ऐसी होइतिहासों के सर पर मढ़ते इल्जामों के जैसी होये तब्दिली का मौसम है तब्दिली के बादल हैंतेरी मेरी सबकी कोशिश ऊजले सावन जैसी होबूढी रस्मे तोड़ फेंकना इतना मेरा मकसद हैतेरे मकसद की सूरत भी मेरे मकसद जैसी होतड़फ रहा है मुल्क ये अपना जंजीरों के पाशो मेंहर जंजीर पर चोट भी गहरी लोहारों के जैसी होजुल्मों के साये में जीना बीते कल की बाते है'हरीश' क्रांति की तैयारी उड़ते बाजों जैसी हो....'

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तू मेरा अपना सा लगे है (ग़ज़ल)

Author : हरीश जयपाल माली      Blog : हरीश... वर्तमान की परछाई      Date : 07-05-2012 14:42:00

'तेरा कूँचा-ऐ-शहर भी मेरा अपना सा लगे हैक्यों रहूँ तन्हा जब  तू मेरा अपना सा लगे है  गुजरे ज़माने की बातें सलीके से क्या करनी जब ये वारदातों का जमाना अपना सा लगे है हर रात चरागों से गुफ्तगू का आलम जारी है पतंगों का जानलेवा इश्क मेरा अपना सा लगे है एक बारगी तुझसे टूट के मुहब्बत भी कर लूं' हरीश'मगर तन्हाई ये मंजर-ऐ-अश्क मेरा अपना सा लगे हैतेरा कूँचा-ऐ-शहर भी मेरा अपना सा लगे हैक्यों रहूँ तन्हा जब  तू मेरा अपना सा लगे है ...!'

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मजा आ जाये (ग़ज़ल)

Author : हरीश जयपाल माली      Blog : हरीश... वर्तमान की परछाई      Date : 06-05-2012 11:17:00

'कुछ तो हो बहाना कि मजा आ जायेगर तू हो करीब मेरे मजा आ जाये ये कोलाहल ये बेहिसाब शोर-शराबा शहर में हो कोई गांव मजा आ जाये मेरे जनाजे को सजाने से पहले उसे मेरी कसम याद दिला दो मजा आ जायेतेरी नज़रों से दूर चला भी जाऊं चुपचाप                  एक बारगी तू कह दे तो मजा आ जाये अब और कितना उसे याद करूं 'हरीश'रफ्ता-रफ्ता भूल ही जाऊं मजा आ जाये कुछ तो हो बहाना कि मजा आ जायेगर तू हो करीब मे(...)'

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जुगनुओं की तरह जला जाये (ग़ज़ल)

Author : हरीश जयपाल माली      Blog : हरीश... वर्तमान की परछाई      Date : 05-05-2012 16:01:00

'तेरे हुस्न का किस्सा तेरा कातिल सुना जाये,बात गर मजे की है बेबाक कुछ तो कहा जाये...!गैरों के घरों में अपने लोग भी नजर आ जाते हैं गली से गुजरते हुए गर बेखौफ झाँका जाये...!खुद मंजिलें अपनी और लौट सकती है अगर अँधेरे सफ़र में भी जुगनुओं की तरह जला जाये...!ता-उम्र मेरी ये ख्वाहिश जिन्दा रहेगी 'हरीश'रूठ जाये गर दुनिया तो मुझसे ना रूठा जाये...!तेरे हुस्न का किस्सा तेरा कातिल सुना जायेबात गर मजे की है बेबाक कुछ तो कहा जाये...!'

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तुझे नज़रंदाज़ कर लूं ( ग़ज़ल)

Author : हरीश जयपाल माली      Blog : हरीश... वर्तमान की परछाई      Date : 04-05-2012 16:08:00

'  ये मुमकिन तो है की तुझे नज़रंदाज़ कर लूं   खफा हो जाऊ कभी खुद से कभी माफ़ कर लूं   तेरी दबी आवाज़ भी सुने एक अरसा बीत गया   हो हुनर तो तेरी आवाज़ को मेरी आवाज़ कर लूं   किस्से मशहूर है लोगो की जुबानी मेरे दिल के  गर बस में होता तो हर किस्से पे ईनाम कर लूंआज फिर कोई गुमनाम बस्ती में लौट आया हैं 'हरीश' बिखर के चरणों में गिरुं या पहले आदाब कर लूं  ये मुमकिन तो है की तुझे नज़रंदाज़ कर लूं   खफा हो जाऊ(...)'

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वक़्त मिले गर तो (नयी ग़ज़ल)

Author : हरीश जयपाल माली      Blog : हरीश... वर्तमान की परछाई      Date : 02-05-2012 16:52:00

'वो ग़मज़दा है मगर मुसकुरा के बात करता हैये उसका सलीका हैं सलीके से बात करता है ...न जाने क्यूँ वक़्त कमबख्त ठहर जाता है वो जब भी मिलता है कुछ करामात करता है ...मैंने बंजर जमीं में गुलाबों की फसल बोई है दरियादिल है तू जो बेवक़्त बरसात करता है ...वक़्त मिले गर तो खुदा से मुहब्बत भी कर लूं 'हरीश' ये बात और है कि वो मुझे मुहब्बत दिन-रात करता है...वो ग़मज़दा है मगर मुसकुरा के बात करता हैये उसका सलीका हैं सलीके से बात करता है ...'

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मैं अकसर देख आया हूँ (ग़ज़ल)

Author : हरीश जयपाल माली      Blog : हरीश... वर्तमान की परछाई      Date : 29-04-2012 16:56:00

'मैं रोते हुए बेबाक चन्द मंजर देख आया हूँ संभलते हुए बेहिसाब लश्कर देख आया हूँ काजल से सजी आँखें भी रूठ जाया करती है पलकों पे सजे अश्कों के दफ्तर देख आया हूँ इक अरसे बाद हंसा है वो तो कोई बात जरुर है वरना उसे सिसकते हुए मैं अकसर देख आया हूँ मैं डूबते हुए सूरज से शिकायत करता भी तो कैसे हर साँझ मुस्कुराते हुए उसे अपने घर देख आया हूँ...!'

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गुजरे पलों की अहमियत

Author : हरीश जयपाल माली      Blog : हरीश... वर्तमान की परछाई      Date : 22-03-2012 13:05:00

'मै अपनी बात करने का मिजाज़ नहीं रखता मुझे अपनों की बाते करना अच्छा लगता है। सहूलियत रहती है दुःख दर्द बाँटने में। आज फिर किसी अपने की याद आई तो लिखने बैठ गया । ना जाने क्यों गुजरे पलों की अहमियत हर रोज बढ़ती ही जाती है। लोग जाने अनजाने में मिलते है बिछुड़ते है और फिर सफ़र शुरू होता है यादों का। परिंदों की मानिंद मुझे भी हक था खुले आसमान में पंख पसारने का। आजादी का मै भी शौक़ीन रहा हूँ ,पर हर रोज आसमान मन मुताबिक खुला नहीं मिलता विचरने को। किसी(...)'

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