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मकबरे के दोनों बुत एक दूसरे का चेहरा देखते सोये थे

Author : Puja Upadhyay      Blog : लहरें      Date : 16-05-2013 04:54:00

'वो बहुत जोर से इस बात पर चौंका था कि मैंने कभी कोठा नहीं देखा था...किसी तरह का चकला, कोई बाईजी का घर नहीं. मैं इस बात पर परेशान हुयी थी कि उसने क्यों सोचा कि मैंने कोठा देखा होगा...शायद उसे मेरी उत्सुकता और मेरे पागलपन से कुछ ज्यादा ही उम्मीद थी. मुझे याद है मैंने हँसते हुए कहा था...कोठे में मेरे लिए क्या होगा...मैं तो लड़की हूँ. इस बात पर हद गुस्सा हुआ था मुझपर...बेवक़ूफ़ लड़की...मैं तुम्हारे लड़की होने की नहीं, लेखक होने की बात कर रहा हूँ...तुम लिखती हो फिर भी कभी तुमने देखने की ज(...)'

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जंकयार्ड डायरीज

Author : Puja Upadhyay      Blog : लहरें      Date : 15-05-2013 04:57:00

'तुम कोई उदास कविता नहीं हो कि तुम्हारे खो जाने पर आंसू बहाए जाएँ...तुम तो जिंदगी का रस हो, राग हो, नृत्य हो...तुम्हारे होने से धूप निकलती है...तुम पास होते हो तो जैसे सब कुछ थिरक उठता है...अब किसी दिन ऐसी ही कोई धुन गुनगुनाते आओगे कि पाँव रुक नहीं पायेंगे तो मैं क्या करूंगी बताओ...फिर कभी कभी सोचती हूँ बड़ी खूबसूरत चीज़...सोलह साल की लड़की होती है तो सोचती है...क्या वो मुझसे प्यार करता है...नहीं करता है...कुछ भी महसूस करता है मेरे लिए...मगर ३० की उम्र पहुँचने पर ऐसी छोटी चीज़ों में (...)'

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तुम सी बस एक है मेरी जान, तोश्का

Author : Puja Upadhyay      Blog : लहरें      Date : 13-05-2013 14:08:00

'मैं उसका नाम तोश्का नहीं रखना चाहती थी...कि इस नाम में बहुत सारी उदासी थी...लेकिन मुझे मालूम ही नहीं चला कब एक शब्द से उठ कर वो एक जीती जागती जिद्दी लड़की बन गयी...रशियन...नीली आँखों और दो सुनहली चोटियों वाली लड़की को ऐसा कौन सा गम था कि मेरी जान खा गयी कि मेरी कहानी लिखो.पहली बार इस शब्द के सामने पड़ी थी तो लगा था कि ये मेरा नाम होना था...तोस्का...लेकिन दन्त स में वो बाद नहीं आती जो तालव्य श में आती है. श से कशिश आती है, कुछ मेरे पसंदीदा शब्दों में श होता है...इश्क, रश्क, अश्क, खान(...)'

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तुम्हें इजाजत है

Author : Puja Upadhyay      Blog : लहरें      Date : 12-05-2013 04:18:00

'वो मुझे ऐसे गले लगाता है जैसे मैं कांच की बनी हूँ...जरा से जोर से टूट जाउंगी...बिखर जाउंगी किरिच किरिच. जितने से मेरी जान चली जाए, उससे बस एक लम्हा ज्यादा रखता है अपनी बांहों में. ऐसा क्यूँ महसूस होता है कि उसने मेरी रूह को छू लिया है? ठीक उस लम्हे, मैं जानती हूँ...मुझे उसे जाने की इजाज़त दे देनी चाहिए.पहले मुझे लगता था उसके आने का नियत मौसम है. वो हर साल नवम्बर से दिसंबर के बीच कभी आएगा. मगर वो बैंगलोर की बारिश की तरह मूडी होता चला गया है. अब उसके आने का कोई नियत वक़्त नहीं है. हमे(...)'

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जरा सा पास, बहुत सा दूर

Author : Puja Upadhyay      Blog : लहरें      Date : 10-05-2013 04:51:00

'इससे तो बेहतर होता कि वे एक दूसरे से हजारों मील दूर रहते. ऐसे में कम से कम झूठी उम्मीदें तो नहीं पनपतीं, हर बारिश के बाद उसको देखने की ख्वाहिश तो नहीं होती. ऊपर वाला बड़ा बेरहम स्क्रिप्ट राइटर है. वो जब किरदार रचता है तो मिटटी में बेचैनी गूंथ देता है. ऐसे लोगों को फिर कभी करार नहीं आता.इस कहानी के किरदार एक दूसरे से २०० किलोमीटर दूर रहते हैं. एक बार तो सोचती हूँ कहानी को किसी योरोप के शहरों की सेटिंग दे दूं...वहां शहर इतने खूबसूरत होते हैं...बरसातों में खास तौर पर. लेकिन उस सेटिंग म(...)'

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सिगरेट सी तुम्हारी उँगलियों के/ फीके बोसे हम चखेंगे

Author : Puja Upadhyay      Blog : लहरें      Date : 02-05-2013 21:44:00

'We are the people in search of a 'Refuge'. That eternal dwelling place where we find peace.---हम पनाह तलाशते हुए लोग हैं.खानाबदोश...हम किसी ज़मीन के अहसानमंद नहीं. हम प्यासे, पानी की खोज में जमीनों को मारे मारे फिरते लोग हैं.हमारी मुट्ठियों में बस पानी की मरीचिका है. हम बेदखल किये लोग हैं. अपनी जमीनों से बेदखल, हम दुनिया में एक ठिकाना तलाशते हैं. हमारे हिस्से की ज़मीनों पर उग आये कारखाने, हमारे हिस्से की ज़मीन धंस गयी खदानों में. कोलियरी के काले चूरे में खोये हुए हम बदकिस्मत नहीं...(...)'

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स्लो मोशन राईटिंग

Author : Puja Upadhyay      Blog : लहरें      Date : 01-05-2013 04:50:00

'आजकल मुझे कोई स्क्रीन अच्छी नहीं लगती. घर आते ही लैपटॉप टीवी से कनेक्टेड और गाने चालू. स्क्रीन ऑफ. मोबाईल चार्जिंग पर. किचन में या तो खाना बनाती हूँ या रोकिंग चेयर पर झूलते हुए अख़बार या मैगजीन पढ़ती हूँ. चैन और सुकून लगता है. आज सुबह लैपटॉप खोला लेकिन फिर जैसे इरीटेशन होने लगी. लिख रही थी, सोचा अपलोड कर देती हूँ. कभी बाद में अपनी हैण्डराईटिंग देखूंगी इधर. कोपियाँ तो जाने कहाँ जायेंगी.ये जो लिफाफा सा दिख रहा है, एक छोटा सा पाउच है, पेन रखने के लिए.खास नहीं. बस. ऐसे ही. '

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न लिखना, न पढ़ना, न फिल्में देखना

Author : Puja Upadhyay      Blog : लहरें      Date : 27-04-2013 08:38:00

'लिखना या तो मुश्किल होता है या तो एकदम आसान. मुझे मुश्किल से लिखना नहीं आता. कितनी बार होता है कि अन्दर बहुत कुछ उमड़ घुमड़ रहा है पर शब्दों का आकार नहीं लेता...तब एक चुभन सी होती रहती है. जैसे कोई कील चुभी हो पाँव में...सिर्फ चलते वक़्त टीसती है. किसी को पढ़ना उसकी आत्मा से बात करने जैसा है. लेखक जितनी ही बड़ी कल्पना की दुनिया रचता है, उतनी ही सच्चाई से अपने आप को उसमें लिखते जाता है. मुझे कम लोगों का लिखना पसंद आता है. जाने क्यूँ कि किसी का लिखा छू नहीं पाता है दिल को. कुछ मि(...)'

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जिला मासूमगंज, थाना मिसरपुर, गाँव पुरैनी

Author : Puja Upadhyay      Blog : लहरें      Date : 20-04-2013 13:34:00

''सुनो, मेरे नाम जो ख़त लिखे थे, वो किसी लाल डब्बे में गिरा दो''क्यूँ?''ख़त लिख के नहीं गिराने से विद्या चली जाती है''कौन सी विद्या''चिट्ठी लिखने की''मुझे कौन सी चिट्ठी लिखनी आती है''वो मैं नहीं जानती, बस मेरे नाम की सारी चिट्ठियां किसी और को भेज दो''किसे भेज दूं?''किसी को भी भेज दो''और जो तुम्हारा नाम लिखा है, सब चिट्ठी के ऊपर सो? पीटेगी न कोई भी लड़की''मेरे नाम की एक ही लड़की को थोड़े जानते हो तुम''इतना प्यार मुहब्बत से लिखा हुआ चिट्ठी है, ऐरी गैरी किसी को भी कैसे भेज दें, उसको समझ(...)'

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गीले कैनवास पर लिखना तुम्हारा नाम

Author : Puja Upadhyay      Blog : लहरें      Date : 16-04-2013 15:53:00

'उसने कलाइयां पकड़ीं थीं...ठीक उसी जगह शिराओं में दिल के धड़कने की हरकत महसूस होती है...दिल हर धड़कन के साथ उसके नाम के अक्षरों को तोड़ रहा था. मैं जितना ही छुड़ाने की कोशिश करती उसकी उसकी उँगलियाँ और तीखेपन से धंसती जातीं...दिल की धड़कन रुकने लगी थी.उस शाम अचानक से पूरी दुनिया के लोग चाँद की साइट्स का मुआयना करने चले गए थे, शायद इस शहर में हम दो लोग ही बचे थे. कमरे में एक ही स्पीकर था छोटा सा, वो मुझे एक इंस्ट्रुमेंटल पीस सुना रहा था. वो टुकड़ा कुछ ऐसा था कि आसपास की सारी चीज़ें विल(...)'

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द हारमोनियम इन माय मेमोरी

Author : Puja Upadhyay      Blog : लहरें      Date : 09-04-2013 03:43:00

'हम अपने आप को बहुत से दराजों में फिक्स डिपाजिट कर देते हैं. वक़्त के साथ हमारा जो हिस्सा था वो और समृद्ध होता जाता है और जब डिपाजिट की अवधि पूर्ण होती है, हम कौतुहल और अचरज से भर जाते हैं कि हमने अपने जीवनकाल में कुछ ऐसा सहेज के रख पाए हैं. ऐसा एक फिक्स डिपोजिट मेरे हारमोनियम में है. छः साल के शाश्त्रीय संगीत के दौरान उस एक वाद्य यंत्र पर कितने गीतों और कितने झगड़ों का डिपोजिट है. आज सुबह से उस हारमोनियम की आवाज़ को मिस कर रही हूँ. हमारा पहला हारमोनियम चोरी हो गया था. शहर की फि(...)'

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वो जो सांवला सा रास्ता था

Author : Puja Upadhyay      Blog : लहरें      Date : 03-04-2013 11:53:00

'रास्ते तुम्हें ढूँढने को बहुत दूर तलक, बहुत देर तक भटके थे. आज उन्हें थकान से नींद आने लगी है. उन्होंने टेलीग्राम भेजा है कि वे अब कुछ रोज़ सुस्ताना चाहते हैं. एक शाम सिगरेट सुलगाने को ऑफिस से बाहर निकली तो देखा कि रास्ता कहीं चला गया है और सामने दूर तलक सिर्फ और सिर्फ अमलतास के पेड़ उग आये हैं. खिले हुए पीले फूलों को देखा तो भूल गयी कि रास्ता कहीं चला गया है और मुझे उसकी तलाश में जाना चाहिए. ऑफिस से घर तक का रास्ता नन्हा, नटखट बच्चे जैसा था...उसे दुनियादारी की कोम्प्लिकेशन नहीं समझ(...)'

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एक अम्ल का माफ़ीनामा

Author : Puja Upadhyay      Blog : लहरें      Date : 02-04-2013 04:41:00

'आपको कभी लगा है कि उम्रकैद सबसे बड़ी सजा होती है...फांसी से भी बड़ी?---मैं चाहती हूँ कि तुम रहो...बेहद तकलीफ में, बेइन्तहा अकेलापन महसूस करने के बावजूद, पागलपन के दौरों के कारण बिजली के झटके दिए जाएँ तुम्हें फिर भी तुम रहो...मेरे अपने स्वार्थ के लिए. दुनिया के किसी भी कोने में, कैसी भी परिस्थिति में मगर रहो. मेरे दिल में जरा भी दया होती तो मैं तुम्हें जहर भिजवा देती, मगर मेरे लिए जरूरी है कि तुम जिन्दा रहो. तुम्हारे लिए नहीं...मेरे लिए. कैसी भी बेज़ार दुनिया हो...मालूम है तुम्हारा ह(...)'

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ऑफिस डायरीज- हाई ऑन लाइफ

Author : Puja Upadhyay      Blog : लहरें      Date : 31-03-2013 05:08:00

'कल ऑफिस की ऑफसाईट थी. पिछले कुछ दिनों से इसमें बहुत सारा काम था और चूँकि ये सबसे सीक्रेट रखना था तो हमारी टीम का काम और भी मुश्किल हो गया था. देर रात तक काम करना, सन्डे को काम करना...परेशान रहना...प्रेशर में रहना. झगड़ा करना. घर पर कुछ भी ध्यान नहीं दे पाना. जाने कितनी रातों से डिनर किया ही नहीं था. ---सुबह साढ़े सात बजे रिजोर्ट के लिए निकलना था. घर से तीस किलोमीटर दूर था. मुझे लॉन्ग ड्राइव्स अच्छी लगती हैं. नेहा को भी बुला लिए थे...यूँ तो अकेले जाना भी अच्छा लगता है...लेकिन ऐस(...)'

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यादों का जंकयार्ड

Author : Puja Upadhyay      Blog : लहरें      Date : 25-03-2013 03:54:00

'वो जो याद के गुलमोहर थे...पटना...सब उधार की यादें हैं...कुछ नया लिखने को जगह ही नहीं है. महसूस हुआ कि यादें भी एक उम्र के बाद कहीं सहेज के रख देनी होती हैं कि वर्तमान के पल के लिए जगह बन सके.मैं बहुत साल बाद गयी थी. पाटलिपुत्रा कोलनी. जहाँ घर हुआ करता था. मोड़ पर, सड़क पर, गुलमोहर के पेड़ों पर. याद की अनगिन कतरनें थीं. धूल का अंधड़ था कि सांस लेने को जगह बाकी नहीं थी.इतने साल बाद भी सारे रस्ते वैसे ही याद थे...किस मोड़ पर रुकी थी...कहाँ पहली बारिश का स्वाद चखा था...कोलेज के आगे का च(...)'

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मुस्कराहट का परजीवी आंसुओं से सिंचता है

Author : Puja Upadhyay      Blog : लहरें      Date : 20-03-2013 14:52:00

'मुस्कराहट का परजीवी आंसुओं से सिंचता है.---और वो खो गया. ऐसे जैसे कभी था ही नहीं. ऐसे जैसे नदी के तट से गुम हुआ हो कोहरा, ऐसे जैसे राम ने ली थी जल समाधि.मुझे देर तक दिखती रही उसकी आँखें, चेहरा बदल बदल कर. सलेटी कपड़े पहने वो कौन था जिसने पूरे धैर्य से मेरी पूरी जिंदगी सुनी और अंत में श्राप देने की जगह सर पर हाथ रखते हुए आशीर्वाद में अभयदान दे गया.संत, महात्मा, दुनिया से विरक्त कोई? मेरे मन को समझने वाला. रात का तीसरा पहर था. अलाव के आखिरी अंगारे बचे थे. प्रेम अपनी ऊष्मा बचाए रखने के(...)'

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दिल के टाइपो एरर

Author : Puja Upadhyay      Blog : लहरें      Date : 15-03-2013 17:56:00

'दिल का अपना ऑटोकरेक्ट होता है. मैं जहाँ जहाँ भी कहानी में तुम्हारी जगह कोई और नाम लिखना चाहती हूँ, वहां लाल अंडरलाइन आ जाती है कि ये शब्द मौजूद नहीं है...पूछता है ये नया नाम है, डिक्शनरी में शामिल कर दूं? नाम एक बार शामिल करने के बाद ऑटोमैटिक करेक्ट हो जाता है. मैं कोई और नाम भी लिखती हूँ तो खुद से तुम्हारा नाम टाईप हो जाता है.मैं लिखती हूँ 'मैं तुमसे प्यार नहीं करती', एक हरी रेखा खिंच जाती है उसके नीचे...डिलीट करके लिखती हूँ 'मैं तुमसे प्यार करती थी' फिर से हरी रेखा आ जाती है. राईट(...)'

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घड़ी तुम्हारे लौट आने का वक़्त नहीं बताती है

Author : Puja Upadhyay      Blog : लहरें      Date : 14-03-2013 15:33:00

'डेज ऑफ़ बीईंग वाइल्ड...एक उदास खालीपन से पूरी भरी हुयी फिल्म है. इसके किरदार कितने रंगों का इंतज़ार जीते हैं...टेलीफोन की घंटी की गूँज को अपने अन्दर बसाए...उदासी का एक वृत्त होता है जिसके रंग बरसात के बाद भी फीके दीखते हैं. कैसा अकेलापन होता है कि अपने सबसे गहरे दर्द को एक नितांत अजनबी के साथ बांटने के लिए मजबूर हो जाता है कोई...इसका टाइटल प्लेट बहुत बहुत दिनों तक मेरा डेस्कटॉप इमेज रहा है. इस शुरुआत में एक अंत की गाथा है...एक कहानी जो आपको सबसे अलग कर देती है...मृत्यु को ज़ूम इन कर(...)'

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कि दिल का रंग होता है...गुलाबी

Author : Puja Upadhyay      Blog : लहरें      Date : 12-03-2013 16:09:00

'वो एक गुलाबी फूलों वाला पेड़ है. उसके पार से नीला आसमान दिखता है...सड़क पर करीने से गिरे हुए गुलाबी फूल हैं. दिल अगर कोई फूल होता तो इसी रंग का होता...ऐसा ही नर्म और नाज़ुक कि तोड़ते हुए आप खुद टूट जाओ. हलकी हवा चलती है तो बहुत से गुलाबी फूल हौले हौले गिरते हैं. रंग इतना हल्का है कि कैमरा में कैद नहीं हो पाता. कुछ हलकी भूरी आँखें याद आती हैं...उनका रंग जैसा मेरी यादों में है, किसी तस्वीर में नहीं है.मैं रोज बाईक से आती हुयी उस पेड़ को देखती हूँ...हफ्ते भर का मौसम है...गुलाबी. रोज सो(...)'

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एक अच्छे वीकेंड की डायरी

Author : Puja Upadhyay      Blog : लहरें      Date : 12-03-2013 04:57:00

'एक सुख की जगह होती है...खालीपन के ठीक पास...वहां पर जब होती हूँ अक्सर कुछ नहीं लिखती हूँ. पिछला वीकेंड बेहतरीन था. फ्राइडे को विमेंस डे था. ऑफिस में इतना अच्छा लगा. लगभग चार बजे एक चोकलेट मूस वाला एक डेजर्ट मिला...किसी लड़के को नहीं दिया गया कि स्पेशल डे है आज. जोर्ज को दिखा दिखा के चिढ़ा के खाने का अपना मज़ा था. फिर एक इंटरनल मीटिंग थी तो हम सारे उसमें व्यस्त हो गए. कांफेरेंस रूम के बाहर बहुत शोर हो रहा था...हमने दरवाजा खोल के देखा तो रेड वाइन की बोतलें थीं, बहुत सारे चोकलेट के डिब(...)'

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चिट्ठाकार

पिछले 24 घंटे में सक्रिय चिट्ठाकार. कोष्ठक में दिखाई गई संख्या पिछले 24 घंटे में प्रकाशित कड़ियों को व्यक्त करती हैं.



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gracefully presented with novelty
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